Akshay tritiya / Aakha teez ka mahatva
वैशाख शुक्ला तृतीया का कभी क्षय नहीं होता है और इसीलिए इसे अक्षय तृतीया अथवा आखा तीज कहते हैं। चार तिथियों को छोड़कर वर्षभर की सभी तिथियों में क्षय एवं वृद्धि होना सम्भव रहता है, लेकिन भारतीय पंचांग निर्माण की गणित में वैशाख शुक्ला तृतीया, कार्तिक शुक्ला नवमी आदि ऐसी तिथियां हैं, जिनका गणितागत कारणों से कभी भी क्षय नहीं होता है और ये दोनों ही क्रमशः त्रेता युग एवं सतयुग के प्रारम्भ की तिथियां हैं अक्षय तृतीया के सन्दर्भ में नारद पुराण में कहा गया है-
वैशाखे शुक्लपक्षे तु तृतीया रोहिणी युता।
दुर्लभा बुधवारेण सोमेनापि युता तथा ।।
अतः अक्षय तृतीया को रोहिणी नक्षत्र तथा बुधवार का योग हो तो सर्वश्रेष्ठ होता है। बुधवार के अभाव में सोमवार भी श्रेष्ठ फलदायी है, लेकिन दोनों वार न हों तो भी अक्षय तृतीया पुण्य प्रदायिनी होती है।
अक्षय तृतीया को दिए गए दान की महिमा प्राचीन भारतीय शास्त्रों में अक्षय बताई गई है। भविष्य पुराण में कहा गया है-
यत् किंचित् दीयते दानं स्वल्पं वा यदि वा बहु।
तत्सवमक्षयं यस्मात्तेनेयमक्षया स्मृता ।।
अर्थात इस दिन दिए गए थोड़े या अधिक दान का फल सदा के लिए अक्षय रह जाता है। दान भी विभिन्न प्रकार के होते हैं। वैसे दान की परिभाषा में कहा गया है-
अपने स्वामित्व को दूर हटाकर दूसरे के स्वामित्व का आरोपण करना ही दान है और सच्चा दान गुप्तदान ही होता है।
अक्षय तृतीया को भारतवर्ष में प्रायः विवाह हेतु बिना पूछा शुभ दिन व मुहूर्त मानते हैं। कुछ जातियों में तो इसी दिन विवाह संपन्न करना सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। इसके पीछे भी अक्षय दान फल की विचारधारा ही होती है। यह कोई शास्त्रीय अबूझ मुहूर्त नहीं होता है। विवाह में कन्या के पिता-माता या परिजनों द्वारा वर को कन्या दान स्वरूप प्रदान की जाती है। कन्यादान का भी शास्त्रों में बहुत महत्त्व बतलाया गया है। अग्निपुराण में कहा है-
दशकूप समा वापी दशवाणी समो हृदः।
दश हृद समा कन्या, दश कन्या समो द्रुमः ।।
अर्थात दस कुएं बनवाने पर जितना पुण्य मिलता है उतना एक बावड़ी बनाने पर मिलता है तथा दस बावड़ी बनाने पर जो पुण्य लाभ होता है, वह एक तालाब बनाने पर मिल जाता है तथा दस तालाब बनाने पर जो पुण्य प्राप्त होता है वह एक कन्या के दान करने पर मिल जाता है।
अतः कन्यादान अत्यंत पुण्यकर्म है और फिर उसके लिए अक्षय तृतीया जैसा शुभ दिन मिले तो लोकधारणा के अनुसार यह दान अक्षय फल को प्रदान करने वाला होता है और इसीलिए हजारों युवक व युवतियां इस दिन विवाह बंधन में बंध जाते हैं।
इस अबूझ मुहूर्त में बालविवाह की प्रथा पुराने समय की शासकीय अराजकता के परिणामस्वरूप आज भी प्रचलन में है। यह पुण्य के स्थान पर पाप करवाने वाली है, अतः शास्त्रीय आयु के अनुरूप ही युवावस्था में विवाह संपन्न करवाने चाहिए ताकि वास्तविक पुण्य का लाभ अक्षय हो सके। आजकल तो दुधमुंहे बालकों एवं अबोध बालक-बालिकाओं का विवाह करके अक्षय पाप के भागी बन जाते हैं, जिसके दुष्परिणाम विवाहित युगल एवं उनके माता-पिता तथा आने वाली पीढ़ियां भोगती रहती हैं। अतः वास्तविक पुण्य प्राप्ति हेतु विवाह योग्य युवक-युवतियों का ही विवाह शास्त्रसम्मत है तथा पुण्यप्रद भी है।
इस धार्मिक पर्व में हमारे प्राचीन भारतवर्ष की उस सामाजिक अर्थव्यवस्था की भी झलक मिलती है जिसके अनुसार जनता बिना किसी दबाव या कानून के केवल धार्मिक प्रवृत्ति से प्रोत्साहित होकर अन्न एवं जल की कमी जैसी राष्ट्रीय समस्याओं का मुकाबला किया करती थी।
शास्त्रानुसार आज के दिन भुने हुए जौ का आटा, शक्कर आदि से युक्त कर ठंडे पानी में मिलाकर दान देने का विधान है। चावल मूंग की खिचड़ी तथा इमली का अम्ल्याणा बनाकर दान दिया जाता है। इस दिन प्याऊ लगाने का भी बड़ा पुण्य बताया गया है और कई लोग वैशाख मास में प्याऊ को प्रारम्भ कर देते हैं ताकि गर्मी से आहत राहगीरों को परेशानी न हो।
इस महापुण्यप्रद अक्षय तृतीया का महत्त्व इससे भी है कि उदंड शासकों को दंड देकर धर्म संस्थापन करने वाले ब्राह्मण वंशावतंश भगवान् परशुरामजी का जन्म माता रेणुका से हुआ था। परशुरामजी की पितृभक्ति विश्व प्रसिद्ध है। उनका पराक्रम एवं रणकौशल भी दीनहीन जातियों के लिए प्रेरणा का वाहक है। अतः अक्षय तृतीया पुण्य प्रदायिका होने के साथ ही पराक्रम की प्रेरणा भी प्रदान करने वाली है।