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Thursday, 19 February 2026

jyotish shastra me Holi ka mahatva/ ज्योतिष शास्त्र में होली पर्व का महत्व

Posted by Dr.Nishant Pareek
ज्योतिष शास्त्र में होली का महत्व 


            व्रत पर्वों का काल निर्णय एवं तिथि निर्धारण ज्योतिषशास्त्र के आधार पर ही किया जाता है. संसार के सभी संप्रदायों, धर्मों या राष्ट्रों के पर्वोत्सवों में में भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सूर्य-चन्द्र की बड़ी भूमिका रहती है, क्योंकि प्रत्येक संवत्सर, माह एवं तिथि का निर्धारण इन्हीं के आधार पर होता है। फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाने वाला होली का त्यौहार भी वसंत ऋतु के प्रारम्भ का संकेत देता है तथा पुरुषार्थ चतुष्ट्य में से काम की प्रभुसत्ता को प्रतिष्ठापित करता है। होली को वसंत सखा कामदेव की पूजा के दिन के रूप में भी शास्त्रों में वर्णित किया गया है। गीता में कहा गया है-

'धर्माविरुद्धोभूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ' अर्थात धर्म संयत काम संसार में ईश्वर की ही विभूति माना गया है। 
           माघ शुक्ला पूर्णिमा को होलिका रोपण के साथ ही वसंत ऋतु का समागमन हो जाता है। यह काल खंड सूर्य एवं चन्द्रमा की परिष्कृत एवं चमत्कृत रश्मियों का हुआ करता है, जिसमें नए उद्गार एवं मनोभाव पैदा होते हैं। एक माह तक मीन का सूर्य एवं कन्या का चन्द्रमा धर्म एवं अर्थ को समभाव से विभाजित करके नई-नई कामनाएं पैदा करते हैं तथा वातावरण में सहज धारा का संचार कर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य अपनी सहजवृत्तियों को कृत्रिम बंधन से मुक्त महसूस करने लगता है। फाल्गुन शुक्ला पूर्णिमा को होली का दहन भक्त प्रहलाद की बुआ

होलिका को पाप का प्रतीक मानकर किया जाता है। होली के आठ दिन पूर्व होलाष्टक प्रारम्भ हो जाते हैं। इन आठ दिनों में क्रमशः अष्टमी को चन्द्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल तथा पूर्णिमा को राहु उग्र रूप लिए हुए काम प्रधान रहते हैं, जिससे मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं।

पौराणिक दृष्टि से प्रहलाद का अधिग्रहण होने के दुःख में यह काल अशुभ माना गया है, लेकिन पर्यावरण एवं भौतिक दृष्टि से पूर्णिमा से आठ दिन पूर्व मनुष्य का मस्तिष्क अनेक सुखद दुखद आशंकाओं से ग्रसित हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप चैत्र कृष्णा प्रतिपदा को अष्टग्रहों की कामुक शक्ति के क्षीण होने पर स्वकीय सहज मनोभावों की अभिव्यक्ति रंग, गुलाल आदि द्वारा प्रदर्शित करता है।

आजकल कई तरह के कुत्सित रंग, कीच आदि का प्रयोग कुछ मनचले लोग करने लग गए, लेकिन परंपरानुसार तो केसर मिश्रित सुगंधित चंदन, अबीर, गुलाल, अष्टगंध, सर्वोषधि जल, प्राकृतिक वृक्षों, जड़ी-बूटियों, जड़ों एवं पत्थरों से निर्मित रंग ही काम में लाए जाने चाहिए, जिनसे अपने शरीर एवं मन में आ रहे भावों को इनमें उड़ेलकर अपने परम प्रिय व्यक्ति तक पहुंचाए जा सकें। होली के दूसरे दिन को गुरु प्रधान लोग हास्य-व्यंग्य की कविता एवं स्तरीय व्यंग्य बाण से न कह सकने वाली बातों को कह डालते हैं। शुक्र प्रधान लोगों की चेष्टाएं शनि के साथ मिलकर अश्लील हो जाती हैं, लेकिन बुध एवं सूर्य के प्रभाव में रहने पर अपने प्रियतम व्यक्ति के प्रति उन्मादपूर्ण व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। राहु-केतु या वक्रगामी पापग्रहों की प्रबलता वाले लोग या तो अन्तर्मुखी बने रहते हैं या फिर अपराधी प्रवृत्ति का प्रदर्शन कर डालते हैं। होली एवं दीपावली एकदम विपरीत व्यवहार के त्यौहार हैं। दीपावली वैश्यवर्णा होती है तो होली शूद्रवर्णा, रक्षाबंधन विप्रवर्ण है तो विजयादशमी क्षत्रियवर्ण प्रधान। वर्ण प्रधानता से अभिप्राय जाति बंधन नहीं है अपितु चतुर्थर्णात्मिका शक्तियां जो प्रत्येक मनुष्य में रहती हैं उन पर्वों पर वैसी-वैसी शक्ति का विशेष प्रादुर्भाव बना रहता है।

होली के दिन सूर्य उच्चाभिलाषी बना रहता है तथा विषुवत् के करीब रहता है जिससे अन्य ग्रह अपने-अपने प्रभाव के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं। यह पर्व शूद्र प्रधान शक्ति संपन्न होने के कारण मनुष्य में छिपी शूद्र मनोवृत्तियां इसी दिन उजागर हो पाती हैं जो उजागर नहीं कर पाते वे वर्षभर पश्चाताप करते रहते हैं। रंग उड़ेलने की प्रक्रिया में भी रंग की संरचना पृथ्वी, जड़ी-बूटी, जल, प्रवाह, मनोवेग लक्ष्य एवं चिंतन का आश्रय लेकर बनी हैं।

विभिन्न प्रकार के रंग सभी ग्रहों से अनुप्राणित होते हैं या ग्रहों का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन मंगल पाषाण चूर्ण से निर्मित गुलाल या अन्य रंगों को, बुध पत्तियों से बने रंगों को, चन्द्रमा जल में मिश्रण के शुक्र मनोवेग को, सूर्य लक्ष्य को एवं गुरु चिंतन को नियंत्रित करता है। एक के हाथ से दूसरे के चेहरे पर या शरीर पर किया जाने वाला प्रेम लेप परस्पर ग्रहजन्य बाधाओं को दूर करता है जो मानसिक, शारीरिक एवं सामाजिक व्यवसाय में सकारात्मक परिणाम प्रदान करने वाला होता है। शनि की प्रधानता कीच, अश्लीलता या मानसिक उद्विग्नता के कारण चन्द्रमा का सहयोग अंतर्मुखी भी बना देता है और ऐसी स्थिति में अनेक लोग आनंद की अनुभूति से दूर होकर अपने आपको सबसे बचाने का प्रयास करते हैं। होली की शिखा का प्रवाह रात्रि में जिस दिशा को जाता है उस दिशा में अनिष्ट की संभावनाएं एवं प्राकृतिक प्रकोप, राजदोष आदि की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

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