Friday, 18 September 2020

Mesh rashi ke anya rashi walo se vivah sambnadh kaise rahenge / मेष राशि के अन्य राशि वालों से विवाह संबंध कैसे रहेंगे, जानिये इस लेख मेंः-

Posted by Dr.Nishant Pareek

Mesh rashi ke anya rashi walo se vivah sambnadh kaise rahenge ?


मेष राशि के अन्य राशि वालों से  विवाह संबंध कैसे रहेंगे, जानिये इस लेख मेंः-

मेष - मेष:- 

अग्नि तत्व का अग्नि तत्व से संबंध अनुकूल तो है किंतु आग के हद से अधिक बढ जाने की आशंका रहती है और कभी कभी वातावरण में गहरा तनाव भी पैदा हो सकता है। शांति और संतोष की आशा करना बहुत अधिक है। दोनों एक दूसरे पर हावि होने का प्रयास कर सकते है। जो तनाव उत्पन्न करते है। आवश्यकता होने पर दोनों एक दूसरे का जमकर पक्ष लेते है। इस जोडे के जीवन में उबाउपन कभी नहीं आयेगा। क्योंकि दोनों में से कोेई शांति से बैठने वाला नहीं है।  यदि दोनों के बीच किसी बात को लेकर विवाद पैदा हो गया तो यह विवाद तब तक जारी रहेगा जब तक उनमें से कोई एक हथियार नहीं डाल देता। इस जोडे के साथ एक खतरा यह भी है कि शारीरिक आकर्षण का ज्वार बहुत जल्दी उतर सकता है। तब दोनों विवाहेत्तर संबंधों में शांति खोजने का प्रयास कर सकते है जो उनके जीवन को असहनीय बना देता है। तब पे्रम का स्थान उतनी ही नफरत ले लेगी। 

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मेष - वृष:- 

अग्नि तत्व और जल तत्व की आवश्यकताओं और स्वभाव में इतनी भिन्नता है कि उनकी पटरी ठीक से बैठ पाना सरल नहीं है। दोनों में से किसी के झुकने के लिये तैयार न होने पर कठिनाई सामने आयेगी। मेष को नए नए उद्यम और चुनौतियां चाहिये। जबकि वृष जातक शांति और सुस्थिरता चाहते है। वृष जातकों की मंदगति और एक ही स्थान पर ठहरे रहने की प्रवृति पर मेष जातक अपना धैर्य खो बैैठते है।

यदि पति मेष राशि है और पत्नी वृष, तो पत्नी को समझ लेना चाहिये कि वह पति को अपनी मनमर्जी से झुका नहीं सकती है। लेन देन की भावना का अभाव दोनों की कमजोरी है। दोनों अपनी अपनी फायदा या सुख देखेंगे। यदि दोनों अपने अपने रूख पर अडे रहे तो ऐसा भी हो सकता है कि उनके बीच संभोग संबंध समाप्त हो जाये अथवा संभोग के समय लडाई झगडा हो। 

यदि पति वृष हो और पत्नी मेष हो तो भी दोनों के संबंध मधुर रहने की संभावना बहुत कम होती है। किसकी मर्जी चलेगी, इस बात पर दोनों में टकराव होता है। पत्नी अपने नये नये विचार पति पर थोपने का प्रयास करती है और पति को वह विचार समझ से परे लगते है। वह हर बात को तर्कपूर्ण तरीके से सोचना चाहता है। वह हर काम में सुरूचि भी खोजता है। भोजन बनाना तक उसके लिये कला का काम है। जिसमें उसकी पत्नी को अपनी सुरूचि का परिचय देना चाहिये। पत्नी के लिये इन सब बातों का कोई महत्व नहीं है और उसकी दिलचस्पी कहीं और ही रहती है। शारीरिक संबंधों में भी पत्नी पति से उससे कहीं अधिक अपेक्षा करेगा जितना वह उसे दे सकती है। पति के लिये यौन संतुष्टि सबसे महत्वपूर्ण है जबकि पत्नी को बाहय संतुष्टि के बिना यौन संबंधों में रस नहीं मिल सकता। 

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मेष - मिथुन:

अग्नि का वायु के साथ मेल ठीक बैठता है। मिथुन जाताकों की हाजिर जवाबी मेष जातकों की संघर्षशील भावना का जोड सिद्ध होती है। दोनों विविधता, कर्मठता और नई नई बातों की खोजों को पसंद करते है। जिससे दोनों की रूचियां समान रहती है और उनका जीवन उबाउ नहीं हो पाता। लेकिन इन संबंधों को स्थायी बनाने के लिये दोनों ओर से काफी लेन देन की आवश्यकता होती है। 

यदि पति मेष जातक हो और पत्नी मिथुन जातिका हो तो पत्नी पहले तो ऐसे पुरूष के चरित्र की दृढता, निद्र्वन्द्वता, आत्मविश्वास, पे्रम या व्यापार के मामले में शीघ्र निर्णय और नई नई योजनाओं के लिये उसकी पहल से काफी प्रभावित होती है। ये बातें उसे अपने व्यक्तित्व के अतुल्य ही लगती है। लेकिन पति शीघ्र ही उस पर हावि होने लगती है। जब इस नये अनुभव का नशा उतरने लगती है तो पत्नी उबने लगती है। रूचियों में भिन्नता से उसकी निराशा और भी बढ जाती है। पति को कला के प्रति पत्नी की रूचि अच्छी नहीं लगती और पत्नी को पति खिलाडीपन पसंद नहीं आता। किसी किसी दिन दोनों में तू तू मैं मैं भी हो जाती है। लेकिन वे अधिक समय तक उसे याद नहीं रखते। 

मेष जातक का पे्रम प्रदर्शन का तरीका भी मिथुन जातिका के लिये बहुत अधिक हो सकता है और वह उसके प्रति उदासीन हो सकती है। यदि यही स्थिति अधिक काल तक चलती रही तो पति पत्नी को ठंडी भी समझ सकता है। मेष पति के लिये मिथुन पत्नी की मानसिकता को समझना कभी संभव नहीं है। परिणामस्वरूप उनके बीच यौन समस्यायें पैदा हो सकती है और उनके संबंधों में दरार पड सकती है। बहस से बात और बिगड सकती है। 
यदि पत्नी मेष जातिका है और पति मिथुन जातक हो तो पत्नी को अपने अंदर संतुलन और धैर्य की गहरी भावना लाने की जरूरत होगी। यह काम उसके लिये सरल नहीं है। पति के क्षण क्षण बदलते मूडों से वह उलझन में पड सकती है। पति का भव्य मिलनसार और दिलचस्प रूप उसे आकर्षित कर सकता है, किन्तु उस पर हावी की अपनी भावना के कारण वह उसे विद्रोही भी बना सकती है। 

मिथुन पति को सबसे अधिक आवश्यकता मानसिक भोजन की होती है। बांध के रखना उसके लिये मरने जैसा है। यौन संबंधों में भी पति को नित नवीनता चाहिये। मेष पत्नी में इतनी बुद्धि नहीं होती कि वह पे्रम में नित नये प्रयोग या आसन कर सके। इसलिये मिथुन पति उससे उबने लगता है।  

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मेष - कर्क:- 

अग्नि और जल मिलकर समस्याऐं पैदा कर सकते है। कर्क जातक संवेदनशील होता है और मेष जातक के मुंहफटपन से उसे चोट पहंुच सकती है। मेष जातक को कर्क जातकों की संवेदनशीलता और भावुकता बिल्कुल नहीं भाती। एक व्यक्तित्व एकदम सीधा सपाट हो और दूसरा इतना जटिल, तो फिर उनके बीच मधुर संबंधों की बात सोचना ही व्यर्थ है। 

यदि पति मेष जातक है तो पत्नी कर्क जातिका, तो पत्नी के कुछ समझ पाने से पहले ही पति उस पर पूरी तरह हावी हो लेता है। शीघ्र ही पत्नी अपने जीवन मूल्यों के अंतर को समझने लगती है। पति को नए नए क्षेत्र चाहिये और पत्नी को शान्तिपूर्ण जीवन। पत्नी को प्यार में जलन अनुभव होने लगती है और वह सोचने लगती है कि यह आग कब तक कायम रहे सकेगी। पति भी महसूस करने लगता है कि वह वासना में अंधा हो गया था और पत्नी उसका साथ नहीं दे सकती। पत्नी की भावनाओं को न तो वह समझ सकता है और न समझने का प्रयास करता है। कर्क पत्नी को रोमांस और प्यार भरी पहल चाहिये, जिसका मेष पति में एकदम अभाव होता है। संतुष्टि नहीं मिलने पर पति उत्पीडन का भी सहारा लेने लगता है। 

यदि पत्नी मेष जातिका है और पति कर्क जातक हो तो पत्नी को अपने पति को समझने में लंबा समय लगता है। उसके उपर एक रक्षा कवच होता है और अंदर एक अत्यंत संवेदनशील हदय, जिसे आसानी से चोट पहुंचा सकती है। कर्क पति अपने विचारों, सपनों, अपनी पुस्तकों व संगीत से चिपका रहता है। यहां तक कि मेष पत्नी इन्हें अपनी सौत समझने लगती है। इनमें उसकी कोई रूचि नहीं रहती। 

कर्क पति एक पे्रमी और एक रक्षक पति की भूमिका निभाना चाहता है। वह चाहता है कि उसकी पत्नी में नारी के से गुण हो। कहे भले ही न, लेकिन यौन संबंधों का मुख्य उददेश्य उसकी दृष्टि में एक बडा परिवार बढाना होता है। मेष पत्नी भला इसे कैसे पसंद कर सकती है। 

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मेष - सिंह:-

यदि दोनों में से कोई भी एक दूसरे पर हावी होने का प्रयास न करे तो अग्नि और अग्नि का यह मेल काफी उत्साहवर्धक हो सकता है। सिंह जातक मेष जातक की गतिशीलता और पहल को सराहेगा तथा मेष जातक सिंह जातक के लंबे चैडे विचारों, सत्ता और उदारता, के रौब में नहीं आयेगा। दोनों राशियां बहिर्मुखी और जीवन से पूर्ण है। अतः संबंध बहुत धूम धडाके वाला रहेगा। 

मेेष पति अपने आत्मविश्वासी और संघर्षशील स्वभाव से सिंह पत्नी के मन में भारी आकर्षण और सम्मान पैदा कर सकता है। चिंता उसे पति के क्रोधी स्वभाव से हो सकती है। दोनों अपने अपने अहम में डूबे रहते है। पत्नी चाहती है कि पति सदा उसकी प्रशंसा करे। और पति चाहता है कि उसके व्यवसाय में पत्नी उसे प्रात्साहित करती रहे। जब उनके अहम् को चोट लगती है तो वे उग्र हो उठते है। फिर उनमें नाटकिय झगडे शुरू हो जाते है। उनसे बचने के लिये पत्नी को कभी कभी पति को विजयी होने का अहसास करा देना चाहिये। दोनों ही संघर्ष को पसंद करते है। अतः उनके जीवन में वाद विवाद की प्रमुख भूमिका होती है। पति को पत्नी की महत्वकांक्षा पर कोई आपत्ति नहीं होती। बस, वह यही चाहता है कि पत्नी की महत्वकांक्षा उससे या उसकी महत्वकांक्षा से आगे नहीं बढ पाये। दोनों ही पूरी सुख सुविधाऐं पसंद करते है। अतः आर्थिक समस्याएं पैदा होने पर उनके जीवन को बहुत कठिन बना सकती है।  उनके स्वभाव की उग्रता उनके यौन संबंधों पर भी प्रभाव डालती है। अतः अपने पे्रम को जीवित रखने के लिये उन्हें काफी समझदारी से काम लेना चाहिये। 

यदि पत्नी मेष जातिका है और पति सिंह जातक हो तो भी दोनों के संबंध धूमधडाके वाले ही होंगे। कठिनाई पति की इस भावना से होगी कि उसकी निरंतर प्रशंसा की जाये और उसे घर का स्वामी समझा जाये। मेष पत्नी अधिक प्रदर्शन में विश्वास नहीं करती। उसे चापलूसी से प्रेम भी पसंद नहीं होता। विशेषकर जब पति की चापलूसी करने वाली कोई अन्य सुंदर महिला हो। अतः ऐसी समझदार मेष पत्नियां स्वयं यह भूमिका निभाकर अपने पति को वश में कर सकती है। इसके बदले में पति पत्नी की बेचैनी को और उसकी मानसिक भूख को चतुराई से शांत करता है। यौन संबंधों में पति पत्नी खूब खुलेपन का परिचय देते है। 

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मेष - कन्या:- 

मेष अग्नि तत्व वाली राशि है तथा कन्य पृथ्वी तत्व वाली राशि है। दोनों के स्वभाव में आकाश पाताल का अंतर है। मेष जातक किसी काम के करने के ढंग और विस्तार की अधिक चिंता नहीं करता, जबकि कन्या जातक की ये स्वाभाविक प्रवृति होती है। अतः यह संबंध घातक हो सकता है। 

यदि मेष पति है और सिंह पत्नी है तो ऐसा पति वर्तमान में जीना पसंद करता है। जबकि पत्नी की एक आंख भविष्य पर लगी होती है। पति धन की बिल्कुल भी परवाह नहीं करता है। वह ये मानकर चलता है कि धन तो कहीं न कहीं से आ ही जायेगा। अपने काम को भी वह मन लगाकर तभी करता है जब उसकी रूचि हो। अतः उसके जीवन में उतार चढाव आते रहते है। इसके विपरीत कन्या पत्नी को हमेशा भविष्य की और आर्थिक सुरक्षा की चिंता रहती है। वह ऐसे काम पसंद करती है जिनमें कडी मेहनत भले ही हो, लेकिन स्थायित्व और सुरक्षा हो। पत्नी यदि पति से कठोर वचन कहती है तो पति प्रायः हंसकर टाल देता है। लेकिन जब बात उसकी सहन शक्ति से बाहर हो जाती है तो वह संबंध विच्छेद करने में भी पीडे नहीं हटता। 

दोनों के भावनात्मक ढांचे में भी भारी अंतर होता है। स्थिति यह है कि कोई किसी के विचारों को नहीं बदल पाता। अतः इस युगल के लिये एक दूसरे को सहन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। भावनाओं का यह अंतर उनके यौन संबंधों में भी प्रकट होता है। 

यदि पत्नी मेष है और पति कन्या है हो तो भी उन्हें प्रेम पूर्वक रहने में भारी कठिनाई का सामना करना पडेगा। दोनों एक दूसरे के सुझावों को काटते रहेंगे जिससे उनके बीच विद्रोह की भावना पैदा होगी। इस प्रवृति पर प्रारंभ में ही अंकुश लगाना चाहिये। आर्थिक मामलों में भी दोनों के खींचतान रहने की संभावना होती है। पति बहुत सावधानी से पैसा खर्च करता है जबकि पत्नी का हाथ काफी खुला रहता है। लेकिन पत्नी जब बीमार पडती है तो उसे कन्या पति से अधिक देखभाल करने वाला दूसरा नहीं मिल सकता। जहां तक यौन संबंधों की बात है तो पत्नी बहुत शीघ्र बेचैनी और उबाउपन अनुभवन करने लगती है। ये तैयार रहे। मेष पत्नी के लिये इसे करना कठिन होता है। 

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मेष - तुला:- 

यह मेल मेष अग्नि और तुला वायु तत्व का मेल है। किंतु कंुडली में ये राशियां एक दूसरे के आमने सामने होने के कारण उनके बीच में आकर्षण और विकर्षण दोनों हो सकते है। इनमें प्रबल शारीरिक या भावनात्मक आकर्षण रहता है। यदि उनमें टकराव होता है तो मेष की जीत होती है और तुला हार जाता है। जहां तक हो सके इस संबंध को टालना ही चाहिये। क्योंकि यह रिश्ता बहुत कमजोर नींव पर खडा होता है। 

यदि पति मेष हो और पत्नी तुला हो तो आरंभ में तो पत्नी उसके दबदबे से प्रसन्न होती है, किंतु उसकी प्रसन्नता अधिक समय तक नही रहती। तुला पत्नी संबंधों की समानता में विश्वास रखती है। शीघ्र ही उसे पता चल जाता है कि मेष पति घर का एकछत्र स्वामी बनना चाहता है। तब उसका सारा उत्साह भंग हो जाता है। तुला पत्नी में अपने को अभिव्यक्त करने की स्वाभाविक प्रतिभा होती है। जबकि मेष पति प्यार के दो शब्द बोलना कमजोरी की निशानी समझता है। पत्नी अपने पिछले संबंधों पर विचार करना चाहती है या भावी संबंधों की योजना बनाना चाहती है। पति इसमें सहयोग करने से मना कर देता है और पत्नी के मन में भविष्य के प्रति असुरक्षा की भावना पैदा हो जाती है। 
पत्नी दूसरों की, विशेषकर संकट में पडे लोगों की सहायता करना चाहती है। पति इसे समय की बर्बादी समझता है। उसे मैं से आगे कुछ नहीं दिखता। कभी कभी वह पत्नी की हीन भावनाओं का भी लाभ उठाने का प्रयास करता है। पत्नी के स्वतंत्र होने की इच्छा उसे चोट पहुंचाती है। यौन संबंधों में भी पत्नी की ओर से पे्रम की पहल का मेष पति गलत मतलब निकाल सकता है। इसे अपने पौरूष को चुनौती समझ सकता है। 

यदि पत्नी मेष हो और पति तुला हो तो पति के रंगीले स्वभाव के कारण काफी कठिनाई पैदा हो सकती है। मेष जातक में विपरीत लिंगियों के लिये भारी आकर्षण पाया जाता है। इसका लाभ उठाकर वह एक सप्ताह किसी लडकी के साथ खिलवाड भी कर सकता है। उसके पे्रम के वादों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिये। मेष पत्नी इसे सहन नहीं करती है और झगडा होता है। इसका परिणाम पति के उठकर चले जाने में होता है। कभी कभी पति कमजोर वर्गों की वकालत भी करने लगता है, जिसे पत्नी समय की बर्बादी समझती है। 

स्ंाबंधों में अधिक तनाव आ जाने पर तुला पति अपना रौद्र रूप भी दिखा सकता है। ऐसे समय में पत्नी को उसके साथ विवादों में नहीं पडना चाहिये। क्योंकि दोनों में से कोई भी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं होता। यौन संबंधों में तुला पति पत्नी से रोमांस की अपेक्षा रखता है। वह चाहता है कि पत्नी उत्तेजक वस्त्र धारण करे। घर के वातावरण को रोमांस पूर्ण बनाए और उसके साथ हर समय रोमांस के लिये तैयार रहे। मेष पत्नी के लिये इसे करना कठिन होता है। 

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मेष - वृश्चिकः- 

यह अग्नि और जल का संयोग है। जो कि भाप बनाता है। दोनों राशियों के स्वामी मंगल ही है। अतः दोनों एक दूसरों की शक्ति और क्षमता को सराह सकते है अथवा उनके बीच तीव्र स्पर्धा जन्म ले सकती है। सीधा सादा मेष जातक वृश्चिक जातक के प्रपंचों को समझ नहीं पाता। फिर भी, यदि दोनों के लक्ष्य समान हो तो यह एक उत्तम जोडी सिद्ध हो सकती है। लेकिन वे एक दूसरे से काफी अपेक्षाऐं रखते है। 

यदि पति मेष हो और पत्नी वृश्चिक हो तो दोनों जन्मजात युद्ध प्रिय होने के कारण एक दूसरे  से लडकर ही अपनी भडास निकाल लेते है। दोनों में से कोई अपनी गलती नहीं मानता है। कार्य के प्रति भावना में भी टकराव होगा। पत्नी चाहेगी कि पति एक ही स्थान पर काम करता हुआ उन्नति करता रहे। पति नया आकर्षक काम सामने आते ही पुराना छोडकर उसकी ओर निकल जाता है। पति को भविष्य की कोई चिंता नहीं है और पत्नी के सीख देने पर उसके दिमाग का पारा चढ जाता है। मेष जातक के लिये भावनाओं का कोई महत्व नहीं रहता। 

यौन संबंधों में पति पत्नी कभी तो घुल मिल जाते है और कभी उनके बीच टकराव होता है। पत्नी के रूठने पर पति के लिये मनाना असंभव हो जाता है। जिसके कारण पति का पारा चढने में भी देर नहीं लगती। यह संबंध बुद्धिमानी वाला नहीं है। पे्रमी तो क्या, ये दोनों दोस्त की तरह भी नहीं रह सकते। 

यदि पत्नी मेष है और पति वृश्चिक है तो पत्नी पति के हावी होने के प्रयासों का विरोध करेगी और जो वह चाहेगा उसका उल्टा करेगी। दोनों में मेल रहना बहुत मुश्किल है। पत्नी की ओर से निराश होकर पति अपना सारा ध्यान अपने व्यापार में लगा देगा। यौन संबंधों में भी पत्नी उससे दूर भागने का प्रयास ही करेगी। वृश्चिक जातको के लिये घरेलू वातावरण का बहुत महत्व होता है और अन्य सभी जातकों की अपेक्षा वे अपनी पत्नियों के प्रति सबसे वफादार रहते है। उनमें यौन की भूख भी अपार होती है। किंतु यह संयोग अपवाद होगा। 

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मेष - धनु:- 

अग्नि का अग्नि से कोई विरोध नहीं होता। लेकिन दोनों अपने अपने विचारों में स्वतंत्र होने के कारण उन्हें एक दूसरे की भावना व स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही होगा। धनु जातक उत्साही, मेष जातक के लिये प्रेरणा का काम करता है। जबकि मेष जातक धनु जातक के आशावादी दृष्टिकोण तथा ईमानदारी की सराहना करता है। दोनों के तीव्र गति में विश्वास करने के कारण शान्ति और शिथिलता की आशा करना व्यर्थ है। कोई दूसरे का रौब स्वीकार नहीं करेगा। सब मिलाकर यह एक सुखद साझेदारी हो सकती है। 

यदि पति मेष हो और पत्नी धनु जातिका हो तो पत्नी के लिये पति के व्यक्तित्व के आकर्षण से बच पाना कठिन होगा। पत्नी पति के हर नये विचार का उत्साह से स्वागत करेगी। भले ही उसका परिणाम कुछ न निकले। पति के ढलते हुये अहम को पत्नी के आशावाद से बहुत सहारा मिलता है। मेष जातक में स्वयं अपने वित्तीय भविष्य की योजना समझदारी से बनाने की बुद्धि नहीं होती। उस पर धनु पत्नी तो एकदम अव्यावहारिक होगी। अतः वित्तीय जिम्मेदारी पति को ही अपने कंधे पर उठानी पडेगी। अन्यथा वित्तीय कठिनाई से उनके मधुर संबंधों में कडवाहट आ सकती है। यदि वे अपने बाहर के व्यस्त कार्यक्रमों से समय निकाल सकें तो उनका वैवाहिक जीवन सुखमय रहेगा। सामान्यतया धनु स्त्रियों की गतिविधियां इतनी बहिर्मुख होती है कि वह अपनी भूख और कहीं शांत कर लेती है। जिसकी उन्हें कोई चिंता नहीं होती। 

यदि पत्नी मेष है और पति धनु है तो बहिर्मुखी जीवन से प्रेम और साथ साथ काम करने की भावना से वे एक दूसरे की ओर आकर्षित होंगे। फिर भी पत्नी को इसमें संदेह हो सकता है कि धनु पति इन संबंधों को अधिक समय तक निभा पायेगा। उधर धनु पति, मेष पत्नी को तब तक आदर्श समझता रहेगा जब तक वह व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उसके विचारों को मान्यता प्रदान करेगी। अपनी ईष्र्या पर नियंत्रण रख सकेगी और पति के निर्दोष हरजाईपन की उपेक्षा कर सकेगी। 

परिपक्वता आने पर पति घरेलू वातावरण के लाभ महसूस करने लगेगा, लेकिन उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। दांव लगाने की प्रवृति उसमें अन्त तक बनी रहती है। काम छोडते भी उसे देर नहीं लगेगी। संयोग से वह इतना भाग्यशाली होता है कि उसके अधिकांश दाव सही लगते है। लेकिन जब उसकी कोई योजना विफल होती है तो घर का सारा भार पत्नी पर आ पडता है। यह एक अस्थायी दौर होता है। क्योंकि पति शीघ्र ही पुरानी सारी क्षति की पूर्ति कर देता है। 

धनु जातक स्वभाव से वफादार नहीं होता। उसे अनेक प्रेम प्रसंगों में रस आता है। और इसके लिये उसके मन में स्वतः कोई अपराध बोध नहीं होता। पत्नी को भी निराश नहीं करता। क्योंकि ऐसा करने से उसके पौरूष के अभिमान को चोट पहुंचती है। उनके संबंध संतोषदायी और कभी कभी आश्चर्यजनक भी रहते है। 

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मेष - मकर:- 

अग्नि और पृथ्वी तत्व का यह योग तनावपूर्ण रहने की संभावना है। मेष का स्वामी मंगल अधीर और जोशीला ग्रह है। जबकि मकर का स्वामी शनि सावधान, शांत व मंद। मकर भविष्य की योजना बनाकर चलना चाहता है और इसके लिये प्रतीक्षा भी कर सकता है। मेष को तत्काल परिणाम चाहिये। प्रतीक्षा से उसे घृणा है। इस योग में लाभ कम और हानि ज्यादा है। 

यदि पति मेष है और पत्नी मकर है तो प्रारंभ में पति के पहली भेंट में ही बोले गये प्रेम के दो बोल पत्नी को अभिभूत कर देंगे। वह उसकी किसी पागलपन से भरी धनकमाउ योजना के प्रति भी आकर्षित होगी। किंतु पति को फिर शीघ्र उसकी सहज बुद्धि और निराशावाद का सामना करना होगा। मेष पति यह नहीं समझ पाता कि उसकी मकर पत्नी जगह जगह धन छिपाकर क्यों रखती है। वह उसे छेडता है। पत्नी पति को दुनिया का सबसे बडा अपव्ययी समझती है। दोनों की पटरी बैठना असंभव है और पति अन्यत्र सुख की खोज कर सकता है। 

सामाजिक दृष्टि से मकर पत्नी को इस संबंध से लाभ हो सकता है। मेष पति अपनी बहिर्मुखी प्रवृत्तियों में उसे भी शामिल करता है और मकर पत्नी की समझ में आने लगता है कि जीवन में काम के अतिरिक्त और भी कुछ है। लेकिन उसके अन्य पुरूषों के संसर्ग में आने से मेष पति के मन में ईष्र्या जन्म ले सकती है। उनके यौन जीवन में गंभीर समस्याएं नहीं आनी चाहिये। जो आती है, वे पत्नी के निराशावादी मूड के कारण आती है। 

यदि पत्नी मेष है और पति मकर है तो मेष स्त्री कभी कभी व्यावहारिकता के दौर पडने पर मकर जातक की ओर आकर्षित हो सकती है। मेष पति के महत्वकांक्षी विचार उसे अच्छे लग सकते है। उसके स्वतंत्रता प्रेम से भी उसकी पटरी बैठ जाती है। उधर मकर पति को मेष पत्नी की शक्ति और चरित्र की दृढता पा सकती है। लेकिन अधिक समय तक साथ साथ रहने पर पति के अपने काम में व्यस्त रहने पर पत्नी के मन में ईष्र्या भाव पैदा हो सकता है। बुनियादी तौर पर मकर पति बहुत सीधा सादा व्यक्ति होता है और मेष पत्नी उसके लिये बहुत भारी पड सकती है। दोनों के स्वभाव में भारी अंतर होता है। कभी कभी पत्नी पति को उसके निराशा के मूड से बाहर निकाल लेती है। लेकिन इससे उनके बीच तीव्र झडपें नहीं रूकती है। 

यौन संबंधों में मकर पति अधिक कामी नहीं होता। किंतु थोथे बहाने कर उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर देने पर वह शीघ्र बुरा मान जाता है। उसकी निराशा भी उसके यौन जीवन को प्रभावित करती है। इस दौर में पत्नी को साध्वी का जीवन बिताने के लिये तैयार रहना चाहिये। 

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मेष - कुंभ:- 

अग्नि और वायु का मेल बैठता है। इस योग में स्वामी ग्रह मेष का मंगल और कुंभ का स्वामी शनि अपार उर्जा पैदा करता है। यह उसके रचनात्मक उपयोग पर निर्भर करता है। कुंभ जातक मेष जातक को और मेष जातक कुंभ जातक को अपना मित्र समझेगा। मेष जातक और कुंभ जातक दोनों को नई और परंपरा से भिन्न बातें पसंद आती है। किंतु यदि किसी कुघडी में कुंभ जातक अप्रत्याशित बात कर दे तो इससे मेष जातक धैर्य खोकर चिढ सकता है। अतः यह योग हलचलपूर्ण किंतु अस्थिर रहता है। 

मेष जातक और कुंभ जातिका की पहली भेंट का परिणाम दोनों के बीच आकर्षण ही हो सकता है। घनिष्ठ संपर्क में आने पर मेष जातक को पता चलेगा कि कुंभ स्त्री की दिलचस्पी अन्य व्यक्तियों में भी है। वह इसे सहन नहीं कर पाता। परिणामस्वरूप दोनों में विवाद होता है। और अहम को चोट लगने से मेष जातक अपना सारा क्रोध कुंभ जातिका पर निकालता है। अधिकांश कुंभ जातिकाएं मित्रता के संबंध पसंद करती है। लेकिन मेष जातक के पास इसके लिये समय नही होता। उसके लिये स्त्री केवल स्त्री होती है। और मित्रता समलैंगिक से ही करता है। मेष व्यक्ति को कुंभ स्त्री के स्वतंत्र वृति अपनाने पर आपत्ति होती है। 

वैसे दोनों अधिक कामी नहीं होते। अन्य गतिविधियों में व्यस्त रहने के कारण भागते दौडते ही उनहें मिलने का समय मिल पाता है। वे इसकी अधिक चिंता भी नहीं करते। 

यदि पत्नी मेष हो और पति कुंभ हो तो पति पत्नी को मित्र और पे्रमिका के रूप में देखना चाहेगा। कुंभ जातक मन से सुधारवादी होते है। वे आफिस, मित्रों आदि सभी को बदलने का प्रयास करते है। भले ही वे सफल न हो। अतः पत्नी का सामना असामान्य और सनकी व्यक्तियों से हो सकता है। कुंभ जातक प्रायः हरफनमौला होते है। वे अधिक कामी नहीं होते है। इसके लिये उन्हें समय ही नहीं मिलता। इच्छा होने पर ही वे प्यार जताते है। और पत्नी उन्हें बहुत स्वार्थी पे्रमी समझती है। 

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मेष - मीनः- 

अग्नि और जल एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत है। दोनों के बीच समानता खोज पाना कठिन है। ओजपूर्ण मेष, मीन की रहस्यमय गहराई को मापने में असफल रहता है। उसके लिये मीन सौम्य या अनिश्चय वाली राशि है। यह संबंध लेन देन की भावना से ही सफल होता है। 

मेष जातक मीन जातिका के विचित्र और बदलते मूड को समझने में हमेशा असमर्थ होता है। किंतु इसे वह अधिक महत्वपूर्ण नहीं समझता। उसका संरक्षणात्मक रवैया मीन जातिका को परेशान कर सकता है। हो सकता है उस समय बीतने के साथ वे अपने को एक दूसरे के अनुकूल ढाल सकें। लेकिन उनके बीच पूर्ण समझ कभी स्थापित नही हो सकती है। मेष पति अनेक बार अपने कार्य में परिवर्तन कर सकता है और नये कार्य में पूरे उत्साह से लग सकता है। मीन पत्नी को इससे कितनी ही परेशानी हो, पति उससे समर्थन की आशा ही करेगा। जिससे तनाव पैदा होगा। पत्नी की वृत्ति पर पति का कोई ध्यान नहीं होता। 

दोनों के बीच यौन संबंधों में भी गलतफहमी हो सकती है। क्योंकि पत्नी रोमांटिक भ्रमों को बनाये रखना चाहती है। पति को पत्नी के साथ अधिक कोमलता बरतनी होगी। और अपनी स्वार्थी भावनाओं को नियंत्रण में रखना होगा। अन्यथा पत्नी की वैवाहिक संबंधों में रूचि समाप्त हो जायेगी। 

मेष जातिका और मीन जातक के संबंध जटिल हो सकते है। पति को निराशा या थकान में पत्नी की शक्ति और सहारे की आवश्यकता होती है। किन्तु ज्यों ही वह उसे दुलारने के लिये स्वयं को तैयार करती है, अचानक पति का पौरूष जाग जाता है और वह संरक्षक पति की भूमिका ग्रहण करने लगता है। कभी कभी मीन पति किसी समस्या को लेकर अपने खोल में घुस जाता है। और पत्नी उससे कट जाती है। वैसे वह अधिकांश निर्णय पत्नी पर छोड देता है। लेकिन यदि पत्नी के निर्ण उसकी योजनाओं से मेल न खाये तो वह उनकी उपेक्षा कर देता है।
 
यौन संबंधों में मीन पति स्थिति के अनुसार अपने को ढाल सकता है। किन्तु वह बहुत संवेदनशील होता है और कोई आलोचना सहन नहीं कर सकता। लडकों के साथ शराब पीने की उसकी प्रवृति से कभी कभी उसके यौन जीवन पर प्रभाव पडता है। पत्नी स्वयं को उपेक्षित महसूस करती है। वैसे उनके लिये ये आनंद के क्षण होते हैं।   

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Friday, 11 September 2020

Mesh rashi ka parichay / मेष राशि का परिचय

Posted by Dr.Nishant Pareek

Mesh rashi ka parichay 


मेष राशि का  परिचय 

मेष राशि के नामाक्षरः- चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, आ। 

राशिचक्र में मेष राशि पहली राशि है। इसे अंग्रेजी में एरिस कहते है। इसका प्रतीक मेढा या भेडा है। भेड जितनी सीधी और अनुशासन प्रिय होती है। भेडा अर्थात नर भेड उतनी ही आक्रामक और स्वच्छंदता पसंद करने वाला होता है। इस राशि का क्षेत्र राशिचक्र के आरंभ से लेकर तीस अंश तक होता है। मेष राशि का स्वामी मंगल है। इसके तीन द्रेष्काण  दस दस अंश के मंगल- मंगल, मंगल- सूर्य, तथा मंगल - गुरू है। 

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मेष राशि के अंतर्गत अश्विनी नक्षत्र के चारों चरण, भरणी नक्षत्र के चारों चरण तथा कृतिका नक्षत्र का पहला चरण आता है। इस तरह नौ नाम अक्षर इस राशि के अंतर्गत आते है। इसका प्रत्येक चरण तीन अंश और बीस कला मान का है। जो कि नवांश के एक पद के समान मान वाला है। इन चरणों के स्वामी इस प्रकार है- अश्विनी प्रथम चरण - केतु मंगल, अश्विनी द्वितीय चरण - केतु शुक्र, अश्विनी तृतीय चरण - केतु बुध, अश्विनी चतुर्थ चरण - केतु चंद्रमा। भरणी प्रथम चरण - शुक्र सूर्य, भरणी द्वितीय चरण - शुक्र बुध, भरणी तृतीय चरण - शुक्र शुक्र, भरणी चतुर्थ चरण - शुक्र मंगल, कृतिका प्रथम चरण - सूर्य गुरू। इन चरणों के नामाक्षर इस प्रकार है- चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, आ। 

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इस राशि का एक अन्य विभाजन त्रिशांश के अनुसार भी है। स्त्री जातक का गुण स्वभाव जानने के लिये त्रिशांश चक्र का विशेष महत्व है। इस चक्र में राशि के पहले अंश मेष के है। जिनका स्वामी मंगल है। पांच से दस अंश तक कुंभ राशि के है। जिनका स्वामी शनि है। दस से अठारह अंश तक धनु राशि के है। जिनका स्वामी गुरू है। अठारह से पच्चीस अंश तक मिथुन राशि के है। जिनके स्वामी बुध है। तथा पच्चीस से तीस अंश तक तुला राशि के है। जिनका स्वामी शुक्र है। गृहमैत्री चक्र के अनुसार मेष राशि सूर्य, चंद्र तथा गुरू के लिये मित्र राशि है। शुक्र तथा शनि सम राशि है तथा बुध के लिये शत्रु राशि है। 

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स्वभाव - प्रभाव:-

मेष राशि अग्नि तत्व वाली राशि है। अग्नि त्रिकोण मेष, सिंह तथा धनु में यह पहली राशि है। इसका स्वामी मंगल है। जो कि स्वयं अग्नि ग्रह है। राशि और स्वामी का यह संयोग इसकी अग्नि या उर्जा को कई गुना बढा देता है। लेकिन पानी के अभाव में आग केवल क्षार ही कर सकती है। उसे भाप में बदल कर रचनात्मक उर्जा का रूप नहीं दे सकती है। यही कारण है कि मेष प्रधान जातक अपनी शक्ति का लगभग दुरूपयोग ही करते है। 

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मेष राशि चर राशि है। इसलिये ये जातक ओजस्वी, दबंग, साहसी, तथा दृढ इच्छाशक्ति वाले होते है। परंतु कभी कभी चंचल प्रकृति व हठी स्वभाव वाले होते है। वे जन्मजात योद्धा होते है। बाधाओं को पार करते हुये अपना मार्ग बनाते है। किसी भी खतरे से डरते नहीं है। स्वच्छंद स्वभाव वाले, तथा अपने कार्य में किसी का भी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करते। यदि अपनी इच्छा से कार्य न करने दिया जाये तो काम छोडकर चले जाते है। इसी स्वभाव के कारण इनके जीवन में अनेक परिवर्तन आते है।

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यदि ये लोग अपने उग्र स्वभाव को नियंत्रण में रख सके तो वे भौतिक रूप से जीवन के हर क्षेत्र में सफल हो सकते है। सरकारी क्षेत्र में उच्च पदों पर जा सकते है। लेकिन इनको झूठी प्रशंसा करने वालों और चापलूसों करने वालों से सावधान रहना चाहिये। ऐसे लोग इनको झूठी प्रशंसा करके बेवकूफ बनाते है। और अपनी प्रशंसा सुनकर मेष राशि वाले अहंकारी हो जाते है। इनमें बहुत जल्दीबाजी होती है। नई योजनाओं को तसल्ली से करने की बजाय जल्दीबाजी में करने के कारण ये अपना काम खुद ही बिगाड लेते है। दूसरों की सलाह सुनना पसंद नहीं करते। दूसरों का कहना नहीं मानते। अपने हिसाब से काम करते है। किसी भी तरह की बात को सहन कर लेते है। अधिक महत्वकांक्षी होने के साथ साथ वे खुले दिल वाले तथा मुंहफट भी होते है। इनके मित्र कम और शत्रु ज्यादा होते है। अपने गुस्से के कारण ये मित्रों को भी शत्रु बना लेते है। इनको हीन भावना से बचना चाहिये। कई बार ये वहशी, नृशंस जैसे हो जाते है। हिंसक स्वभाव हो जाता है। कठोर अनुशासन प्रिय होते है। अस्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त करते है। अपने अधिनस्थों के लिये कठोर स्वभाव वाले होते है। प्राचीन परंपराओं और रीतिरिवाजों का विरोध करते है। बिना मतलब किसी के भी झगडे में पड जाते है। 

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ये लोग अपने कपडों का विशेष ध्यान रखते है। हमेशा साफ सुथरे नये कपडे पहनते है। सभी पर अपना रौब जमाना चाहते है। मेष राशि की लडकियां भी लडको की तरह ही महत्वकांक्षी और आदर्शवादी होती है। उनमें भी पुरूष जातको की तरह ही गर्मजोशी और उर्जा पायी जाती है। अपने दबंग स्वभाव और व्यक्तित्व के कारण वे सामाजिक जीवन में अग्रसर होती है। 

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कार्यक्षेत्र:- 

सुदृढ आत्मविश्वास वाले ये लोग बडे बडे व्यापारिक संगठनों को चलाने की क्षमता रखते है। यदि ये खुद पर नियंत्रण रखें तो जीवन की प्रत्येक सफलता को प्राप्त कर सकते है। इनका अनुमान हमेशा सही जाता है। ये चाहते है कि घर तथा व्यापार में इनकी बात ही सर्वोपरि हो। इनमें धन कमाने की बहुत लालसा होती है तथा क्षमता भी अच्छी होती है। जिन कामों में लम्बे चैडे खर्चों की बात होती है, वही काम इनको पसंद आते है। प्रबंध के मामले में एक तरफ जहां ये व्यवहारिक हो जाते है। वहीं दूसरी तरफ ये आवेश और अनुशासन भी अधिक पसंद करते है। इनके दिमाग में हमेशा बडी बडी योजनाएं चलती रहती है। बहुत बार आवेश में आकर ये निर्णय ले लेते है। जिनके कारण इनको कभी नुकसान भी होता है। 

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ये जातक सट्टेबाजी में भी रूचि रखते है। इसके बजाय यदि ये बु़िद्धमानी से सोचसमझ कर काम करे तो इन्हें बहुत फायदा हो सकता है। इनको कोर्ट केस आदि झंझटों से बचना चाहिये। ऐसे मामलों में पडने पर ये ज्यादा उलझ जाते है। जिन कामों में इनका नाम होता है, वे काम करना ये ज्यादा पसंद करते है।

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ये लोग राजनीतिक नेता, संगठन के नेता, उपदेशक, वक्ता, कम्पनी प्रमोटर, सैनिक या पुलिस अधिकारी, रसायन शास्त्री, शल्य चिकित्सक, लोहा व इस्पात कर्मी, यंत्री आदि के रूप में विशेष सफलता प्राप्त करते है। गलत संगत में फंसने पर ये अपराध भी कर सकते है। इसके अलावा कसाई, नाई, अमीन, लुहार, दर्जी, नानबाई, हथियार बनाना, घडी बनाने वाले, रंगसाज, रसोइये, बढई, मुक्केबाज, विधि सलाहकार, अग्निशमन अधिकारी, संतरी, जासूस, पहलवान, भटटी कर्मी, खेल सामग्री विके्रता आदि। 

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विवाह, प्रेम तथा दोस्ती:-

मेष जातकों के भावनात्मक जीवन में प्रेम और मित्रता का प्रमुख स्थान होता है। अपने प्रेम प्रदर्शन में वे अत्यन्त उन्मुक्त और साहसी होते है। अपने मधुर स्वभाव से विपरीत लिंग को अपनी तरफ आकर्षित करते है। इनमें भी वे स्वच्छंदता, साहस, अधैर्य, तथा भावावेश पर नियंत्रण कर सके तो उनका वैवाहिक जीवन बहुत अच्छा व सुखमय रह सकता है। लेकिन वे ऐसा नहीं करते है। आवेश में आकर अपने ही जाल में फंस जाते है। इनके लिये सबसे अच्छी बात यह होगी कि वह अपने जीवन को व्यवस्थित करे। विवाह के बंधन में बंध जाये। परंतु इनके गुस्से के कारण ये लोग अपना जीवन स्वयं बिगाड लेते है। अपने आदर्श जीवनसाथी की खोज में ये अनेक प्रेम प्रसंग बनाते है। इन जातकों के लिये निष्ठा का अधिक महत्व नहीं होता। इनकी मैं के कारण ही इनके संबंध टूटते रहते है। इसके परिणामस्वरूप इनको प्रेम संबंधों में बहुत पीडा होती है। ये लोग स्त्रियों के मन को पढ नही पाते है। उनके साथ संबंधों में गलतियां कर देते है। परंतु यदि ये लोग लेन देन की भावना से काम करेंगे तो सुखी रहेंगे। 

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इनका व्यक्तित्व आकर्षक होता है। परंतु ये किसी की बात सुनने को तैयार नहीं होते। यदि ये अपने स्वार्थ और कामवासना को नियंत्रित कर सके तो इनकी बहुत सी समस्यायें सुलझ सकती है। फिर मेष राशि वाले जातक एक अच्छे साथी, मित्र व प्रेमी सिद्ध हो सकते है। विपरीत लिंग के प्रति इनमें कोई भी गंदे विचार नहीं होते। वे उनके प्रति सराहना की भावना रखते है। वे खुद महिलाओं की रक्षा करने की भावना रखते है।
 

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मेष राशि की स्त्रियां भी बहुत आदर्शवादी होती है। प्रेम और वैवाहिक संबंधों के टूटने का डर इनको भी रहता है। वे रक्षक पुरूषों की तरफ जल्दी आकर्षित होती है। उनके समक्ष समर्पण के लिये तैयार रहती है। ये पे्रम प्रसंगों में बढ चढ कर सहयोग करती है। इसमें उनकी इच्छा प्रबल होती है। यदि इनको कोई दुर्बल पुरूष मिल जाता है तो उसे ये तुरंत ही छोड देती है। यदि उनका पति दुर्बल हो तो ये तुरंत उस पर हावि हो जाती है। इस राशि की स्त्रियां हाजिर जवाब और स्वच्छंद स्वभाव वाली होती है। वे अपने रूप रंग पर घमंड करने वाली तथा शान शौकत दिखाने वाली होती है। अपने परिवार के बारे में बढ चढ कर बोलती है। जलन और घमंड ही इनकी सबसे बडी कमजोरी होती है। ये हमेशा यह चाहती है कि उनका पति हमेशा उनके पीछे भागे। उनकी तारीफ करे। उनके मुंह पर किसी और स्त्री की तारीफ न करे। यदि कोई सीधा साधा आदमी इनका पति बन जाये तो उसकी जिंदगी नरक बन जाती है। यदि ये रोमांस के रंग में आ जाये तो फिर सारी शर्म त्याग कर संभोग का पूरा आनंद लेती है। 

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सिंह या धनु राशि के व्यक्ति मेष जातिका के लिये अच्छे पति सिद्ध हो सकते है। तुला वाले भी हर स्थिति में उनसे शांति बनाकर के उनके गुस्से को कम कर सकते है। लेकिन इनमें सबसे पहले अच्छे और सकारात्मक पति के रूप में मेष वाले जातक ही होंगे। उनको सुंदर, चतुर व अच्छी पत्नियां ही चाहिये। अपने रंग में आने पर वे भी अपनी क्षमता से अधिक खर्च करते है। अतः मेष वाले जातकों की पत्नियों को अपने पति से मिले धन का एक भाग बचा कर रखना चाहिये।

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मेष राशि वाले व्यक्ति अपने परिवार से बहुत पे्रम करते है। वे अपना ज्यादातर समय परिवार के साथ बिताने का प्रयास करते है। अपने घर को साफ सुथरा रखने का प्रयास करते है। अच्छे से अतिथि सत्कार करते है। दोस्तों की कोई कमी नहीं होती। 

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स्वास्थ्यः- 

मेष राशि के जातक बहुत ही चंचल, आवेश में रहने वाले, तथा लंबे लंबे कदम चलने वाले होते है। उनका सिर बडा होता है। घने रूखे बाल होते है। नाक सीधी व होंठ आगे से निकले हुये होते है। लंबा चेहरा होता है। स्वास्थ्य के मामले में ये सुखी होते है। परंतु अधिक परिश्रम करने के कारण खुद की तबीयत खुद ही खराब कर लेते है। इसलिये उनको संयम से काम करना चाहिये। दूसरों पर भरोसा नहीं करते। इनमें रोगों से लडने की पूर्ण क्षमता होती है। लेकिन इनको छोटी छोटी चोटों व गंभीर दुर्घटनाओं से सावधान रहना चाहिये।

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सबसे अधिक खतरा इनको अपने सिर और चेहरे से है। जो कि मेष राशि के प्रभाव में है। मेष से छठा रोग भाव कन्या राशि का स्थान है जो कि पाचन क्रिया से जुडा है। अतः मेष राशि के जातक सिरदर्द, जलन, तीव्र रोग, मस्तिष्क रोग, पक्षाघात, मिर्गी, मुंहासें, अनिद्रा, दाद, आधाशीशी, चेचक, मलेरिया, आदि रोगों से पीडित हो सकते है। उन्हें आराम का विशेष ध्यान रखना चाहिये। शाक सब्जियों का सेवन करना चाहिये। मांस मदिरा आदि नशे से दूर रहना चाहिये। 

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मेष राशि का बच्चा बचपन से ही झगडालू मारपीट, गाली गलौच वाला होता है। वह निरंकुश, मौलिक खेलप्रिय, तथा सभी कार्यों में आगे बढकर हिस्सा लेता है। जिससे उसे जल्दी ही लोकप्रियता मिल जाती है। इसके सिर में चोट लगती रहेगी। इस विषय में अवश्य ध्यान रखें कि ज्यादा चोट न लग जाये।

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द्रेष्काण, नक्षत्र व त्रिशांशः-
 
लग्न या चंद्र, इनमें से जो भी बली हो, वह किस द्रेष्काण में है, किस नक्षत्र पद या त्रिशांश में है, इसका भी जातक के चरित्र तथा स्वभाव पर भारी पडता है। हमारे विचार से इस संबंध में लग्न मेष के लिये यह देखना उचित रहेगा कि लग्न किस द्रेष्काण में है। इसी प्रकार चंद्र मेषों के लिये उनका नक्षत्र पद देखना उचित होगा। नाम मेषों का भी उनके नाम के पहले अक्षर के अनुसार केवल नक्षत्र पद देखना संभव होगा। सूर्य मेष के अनुसार गोचर का फलादेश करने की प्रणाली अधिकांशतः पश्चिमी देशों में है। इसमें सायन सूर्य की स्थिति देखी जाती है। 

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मेष के पहले द्रेष्काण पर दुहरे मंगल का प्रभाव है। अतः राशि के पहले दस अंशों में लग्न की स्थिति होने पर जातक के स्वभाव में आवेश की मात्रा ज्यादा होती है। उसमें बिना सोचे समझे किसी भी दिशा में छलांग लगाने की प्रवृति पाई जाती है। मध्य द्रेष्काण में राशि के दसवें अंश से बीसवें अंश तक, लग्न की स्थिति होने पर यद्यपि जातक के स्वभाव में मंगल और सूर्य के योग से उर्जा की कोई कमी नहीं होगी, तथापि निरंकुशता का स्थान उदारता और शालीनता ले लेगी। इससे उसमें अभिमान और चापलूसीप्रियता जैसे गुण भी आ सकते है। तीसरे द्रेष्काण में अर्थात राशि के अन्तिम दस अंशों में लग्न की स्थिति होने पर गुरू मंगल की उग्र प्रवृतियों को बहुत सीमा तक शांत करेगा। जातक अधिक संतुलित व्यवहार का परिचय देगा, लेकिन उसकी अधिकांश प्रवृतियां एक ही दिशा में प्रवृत करेगा। 
नक्षत्र पदों में अश्विनी के पहले चरण का स्वामी केतु मंगल जातक को क्रोधी और निरंकुश बनायेगा। दूसरे चरण का स्वामी केतु शुक्र उसे विलासी बनाता है। तीसरे चरण का स्वामी केतु बुध उसके विचारों में अस्थिरता लायेगा। जबकि चैथे चरण के स्वामी केतु चंद्रमा उसमें भाप जैसी उर्जा पैदा करेगा। भरणी के पहले चरण का स्वामी शुक्र सूर्य व्यक्ति को अभिमानी व खुशामदप्रिय बनायेगा। दूसरे चरण का स्वामी शुक्र बुध बौद्धिक कार्यों में प्रवृत करेगा। तीसरे चरण का स्वामी शुक्र शुक्र जातक को संतुलित या दुहरे व्यवहार की प्रवृति देगा। चैथे चरण का स्वामी शुक्र मंगल उसमें उग्रता के साथ मन के भावों को प्रकट न होने देने का गुण प्रदान करेगा। कृतिका के पहले चरण का स्वामी सूर्य गुरू उसमें उदारता और शालीनता लायेगा। 

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कुछ विशेषः- 

भारतीय आचार्यों ने मेष राशि का रक्त वर्ण कहा है। ये लोग अपने व्यवहार में इसी रंग को पसंद करते है। इस राशि का रत्न मूंगा है।  यह पूर्व दिशा की संकेतक है। इसका स्वामी मंगल है। मंगल का मूलांक 9 है। कीरो के अनुसार यह अंक भारी उथल पुथल का अंक है। मेष जातकों के जीवन में यह अंक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वारों में मंगलवार है। मंगलवार के अधिष्ठाता भगवान कार्तिकेय है। जिनका वाहन मोर है। 

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मेष राशि निम्न वस्तुओं, स्थानों तथा व्यक्तियों की संकेतक है- 

बम, विस्फोटक पदार्थ, भारी अम्ल, रेल, टैक्टर, बसें, मोटर, मशीनें, लोहा, इस्पात, चारागाह, रेतीली भूमि, पहाडी निर्जन स्थान, चोरों के अडडे, टेकरियां, पशुओं के बाडे, नई जोती हुई भूमि, सैनिक व पुलिस अधिकारी, रक्षा विभाग के कर्मचारी, शल्य चिकित्सक, कसाई, नाई, लुहार, दर्जी, नानबाई, घडी निर्माता, रसायन शास्त्री, अमीन, चोर, रंगसाज, बढई, मुक्केबाज, लोहा, इस्पात कर्मचारी, दमकल कर्मी, भटटा मिल मजदूर आदि। 

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Navagraho ke saral upay / नौ ग्रहों के सरल उपाय

Posted by Dr.Nishant Pareek

Navagraho ke saral upay 

नौ ग्रहों के सरल उपाय

ज्योतिष के अनुसार आकाश में भ्रमण करने वाले नौ ग्रहों का पृथ्वी पर स्थित सभी प्राणियों, पेड - पौधों तथा जीव जंतुओं पर समान रूप से प्रभाव पडता है। इन ग्रहों के शुभ फल प्राप्त करने के लिये तथा अशुभ फलों के निवारण के लिये ज्योतिष के प्राचीन आचार्यों ने अनेक शास्त्रोक्त उपाय बताये है।  जिनका विधि विधान व पूरी भावना से पालन करने पर निश्चित रूप से लाभ होता है। ग्रहों की अशुभता निवारण हेतु प्रस्तुत है सरल उपायः- 

सूर्य को बली करने के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


चंद्रमा को बली करने के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


मंगल शांति के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


बुध को बली करने के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


गुरू को बली करने के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


शुक्र को बली करने के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


शनि को बली करने के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


राहु शांति के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


केतु शांति के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


कालसर्प दोष शांति के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


मांगलिक दोष का संपूर्ण विवेचन जानने के लिये क्लिक करे।


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Wednesday, 26 August 2020

Manglik dosh se jude sabhi prashno ke shastrokt uttar / मांगलिक दोष से जुडे सभी प्रश्नों के शास्त्रोक्त और सैद्धान्तिक उत्तर।

Posted by Dr.Nishant Pareek

 Manglik dosh se jude sabhi prashno ke shastrokt uttar


मांगलिक दोष से जुडे सभी प्रश्नों के शास्त्रोक्त और सैद्धान्तिक उत्तर। 


मांगलिक दोष के विषय में समाज में अजीब तरह का भय व्याप्त है। कोई भी व्यक्ति अपने बच्चों के विषय में यह नहीं सुनना चाहता कि उसके बच्चे मांगलिक है। क्योंकि मांगलिक दोष के विषय में अनेक प्रकार की भ्रांतियां अथवा झूठा प्रचार फैलाकर तथाकथित पंडित अथवा ज्योतिष का काम करने वाले लोग आमजन को लूट रहे है। और सामान्य जनता जिसे ज्योतिष का ज्ञान नहीं होता, वे लोग आसानी से इन ठगों के चंगुल में फंस जाते है।

इन सभी बातों को ध्यान में रखकर इस गंभीर समस्या पर आज मैं आपके समक्ष मांगलिक दोष के विषय में एक शास्त्रोक्त और सैद्धान्तिक लेख प्रस्तुत कर रहा हूं। जिसमें आपको मांगलिक दोष से संबंधित सभी प्रश्नों का उत्तर सरल भाषा में मिलेगा। जैसे-

मांगलिक दोष कैसे बनता है ? क्या होता है ? कितने प्रकार का होता है ? इसके विषय में फैली भ्रांतियां और उनका निराकरण, एक, चार, सात, आठ, बारह भावों में बैठे मंगल के परिणाम, मांगलिक दोष की शांति के शास्त्रोक्त समाधान व सरल उपाय तथा प्रत्येक लग्न में स्थित मांगलिक दोष की शांति के सरल और सुलभ उपाय बताये गये है। जिनको अपनाकर आप अपने मंगलदोष को शांत कर सकते है।


कैसे बनता है कुंडली में मांगलिक योग, जानने के लिये क्लिक करें।

मांगलिक दोष कितने प्रकार के होते है। यहां क्लिक करके विस्तार से जानिये।


मांगलिक योग के बारे में फैले भ्रम और उसके शास्त्रोक्त सत्य को जानने के लिये क्लिक करे।




पहले भाव में मांगलिक दोष का शुभ अशुभ सामान्य फल जानने के लिये क्लिक करे



चैथे भाव में मांगलिक दोष का शुभ अशुभ सामान्य फल जानने के लिये क्लिक करे



सातवें भाव में मांगलिक दोष का शुभ अशुभ सामान्य फल जानने के लिये क्लिक करे।



आठवें भाव में मांगलिक दोष का शुभ अशुभ सामान्य फल जानने के लिये क्लिक करे।



बारहवें भाव में मांगलिक दोष का शुभ अशुभ सामान्य फल जानने के लिये क्लिक करे।



मांगलिक दोष के सैद्धान्तिक परिहार अथवा निवारण जानने के लिये क्लिक करे।



मांगलिक दोष की शांति के शास्त्रोक्त उपाय जानने के लिये क्लिक करे। 



मांगलिक दोष की शांति के सरल उपाय जानने के लिये क्लिक करे।



मेष, वृष तथा मिथुन लग्न में मांगलिक दोष की शांति के सरल उपाय जानने के लिये क्लिक करे।



कर्क, सिंह तथा कन्या लग्न में मांगलिक दोष की शांति के सरल उपाय जानने के लिये क्लिक करे। 



तुला, वृश्चिक तथा धनु लग्न में मांगलिक दोष की शांति के सरल उपाय जानने के लिये क्लिक करे। 



मकर, कुंभ तथा मीन लग्न में मांगलिक दोष की शांति के सरल उपाय जानने के लिये क्लिक करे। 


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Monday, 17 August 2020

Barah bhavo me ketu ka shubh ashubh samanya fal or upay / बारह भावों में केतु का शुभ अशुभ सामान्य फल और उपाय

Posted by Dr.Nishant Pareek

 Barah bhavo me ketu ka shubh ashubh samanya fal or upay 



बारह भावों में केतु का शुभ अशुभ सामान्य फल और  उपाय 

केतु एक रूप में स्वरभानु नामक असुर के सिर का धड़ है। यह सिर समुद्र मन्थन के समय मोहिनी अवतार रूपी भगवान विष्णु ने काट दिया था। यह एक छाया ग्रह है।  माना जाता है कि इसका मानव जीवन एवं पूरी सृष्टि पर अत्यधिक प्रभाव रहता है। कुछ मनुष्यों के लिये ये ग्रह ख्याति पाने का अत्यंत सहायक रहता है। केतु को प्रायः सिर पर कोई रत्न या तारा लिये हुए दिखाया जाता है, जिससे रहस्यमयी प्रकाश निकल रहा होता है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार राहु और केतु, सूर्य एवं चंद्र के परिक्रमा पथों के आपस में काटने के दो बिन्दुओं के द्योतक हैं जो पृथ्वी के सापेक्ष एक दुसरे के उलटी दिशा में (१८० डिग्री पर) स्थित रहते हैं। चुकी ये ग्रह कोई खगोलीय पिंड नहीं हैं, इन्हें छाया ग्रह कहा जाता है। सूर्य और चंद्र के ब्रह्मांड में अपने-अपने पथ पर चलने के कारण ही राहु और केतु की स्थिति भी साथ-साथ बदलती रहती है। तभी, पूर्णिमा के समय यदि चाँद केतु (अथवा राहू) बिंदु पर भी रहे तो पृथ्वी की छाया परने से चंद्र ग्रहण लगता है, क्योंकि पूर्णिमा के समय चंद्रमा और सूर्य एक दुसरे के उलटी दिशा में होते हैं। ये तथ्य इस कथा का जन्मदाता बना कि "वक्र चंद्रमा ग्रसे ना राहू"। अंग्रेज़ी या यूरोपीय विज्ञान में राहू एवं केतु को क्रमशः उत्तरी एवं दक्षिणी लूनर नोड कहते हैं

 

हिन्दू ज्योतिष में केतु अच्छी व बुरी आध्यात्मिकता एवं पराप्राकृतिक प्रभावों का कार्मिक संग्रह का द्योतक है।  केतु विष्णु के मत्स्य अवतार से संबंधित है। केतु भावना भौतिकीकरण के शोधन के आध्यात्मिक प्रक्रिया का प्रतीक है और हानिकर और लाभदायक, दोनों ही ओर माना जाता है, क्योंकि ये जहां एक ओर दुःख एवं हानि देता है, वहीं दूसरी ओर एक व्यक्ति को देवता तक बना सकता है। यह व्यक्ति को आध्यात्मिकता की ओर मोड़ने के लिये भौतिक हानि तक करा सकता है। यह ग्रह तर्क, बुद्धि, ज्ञान, वैराग्य, कल्पना, अंतर्दृष्टि, मर्मज्ञता, विक्षोभ और अन्य मानसिक गुणों का कारक है। माना जाता है कि केतु भक्त के परिवार को समृद्धि दिलाता है, सर्पदंश या अन्य रोगों के प्रभाव से हुए विष के प्रभाव से मुक्ति दिलाता है। ये अपने भक्तों को अच्छा स्वास्थ्य, धन-संपदा व पशु-संपदा दिलाता है। मनुष्य के शरीर में केतु अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। ज्योतिष गणनाओं के लिए केतु को कुछ ज्योतिषी तटस्थ अथवा नपुंसक ग्रह मानते हैं जबकि कुछ अन्य इसे नर ग्रह मानते हैं। केतु स्वभाव से मंगल की भांति ही एक क्रूर ग्रह हैं तथा मंगल के प्रतिनिधित्व में आने वाले कई क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व केतु भी करता है। यह ग्रह तीन नक्षत्रों का स्वामी है: अश्विनी, मघा एवं मूल नक्षत्र। यही केतु जन्म कुण्डली में राहु के साथ मिलकर कालसर्प योग की स्थिति बनाता है।

 

केतु के अधीन आने वाले जातक जीवन में अच्छी ऊंचाइयों पर पहुंचते हैं, जिनमें से अधिकांश आध्यात्मिक ऊंचाईयों पर होते हैं। केतु की पत्नी सिंहिका और विप्रचित्ति में से एक के एक सौ एक पुत्र हुए जिनमें से राहू ज्येष्ठतम है एवं अन्य केतु ही कहलाते हैं। केतु की पृथ्वी से दूरी, व्यास, गति, चक्रत्व सभी कुछ राहु के समान ही है एवं राहु के ठीक सामने होता है  फल राहु से भिन्न होता है किंतु दुर्घटना, जलघात का प्रमुख कारक ग्रह होता है  इसका पैरों के तलवों पर विशेषाधिकार होता है  यह मेष राशि का स्वामी है एवं अत्यंत बली तथा मोक्षप्रद माना गया है  इसके अपने नक्षत्र अश्विनी, मघा तथा मूल हैं  यह नपुंसकलिंग और तामस स्वभाव वाला है  केतु की मित्र राशियां मिथुन, कन्या, धनु, मकर और मीन हैं  यह गुरु के साथ सात्विक तथा चंद्र एवं सूर्य के साथ शत्रु व्यवहार करता है  अपने स्थान से सप्तम स्थान को यह पूर्ण दृष्टि से देखता है  इसकी विंशोत्तरी महादशा काल 7 वर्ष की होती है  यह भी क्रूर ग्रह तथा कृष्ण वर्ण का माना गया है  चर्म रोग, हाथ-पांव के रोगों का अध्ययन इस ग्रह के माध्यम से होता है  केतु के अशुभ प्रभाव से गुप्त बीमारियों, गुप्त चिंताओं का भय रहता है  बिच्छू अथवा सर्पदंश की संभावना भी रहती है  आग लगने एवं हड्डी टूटने का अंदेशा रहता है  इसका प्रभाव मंगल जैसा ही होता है  फर्क इतना होता है कि मंगल का स्पष्ट और सामने होता है जबकि केतु गुप्त रूप से आक्रमण करता है  केतु द्वारा उत्पन्न हुई बीमारी तो कभी-कभी सालों बाद पकड़ने में आती हैं जैसे कैंसर अथवा अल्सर  जिस व्यक्ति की कुंडली में केतु अरिष्ट हो उसे सतर्क रहना चाहिए 


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Sunday, 16 August 2020

Barah bhavo me rahu ka shubh ashubh samanya fal or upay / बारह भावों में राहु का शुभ अशुभ सामान्य फल व उपाय

Posted by Dr.Nishant Pareek

Barah bhavo me rahu ka shubh ashubh samanya fal or upay





बारह भावों में राहु का शुभ अशुभ सामान्य फल व उपाय


पौराणिक कथाओं के अनुसार राहु ग्रह असुर स्वरभानु का कटा हुआ सिर है, जो ग्रहण के समय सूर्य और चंद्रमा का ग्रहण करता है। इसे कलात्मक रूप में बिना धड़ वाले सर्प के रूप में दिखाया जाता है, जो रथ पर आरूढ़ है और रथ आठ श्याम वर्णी कुत्तों द्वारा खींचा जा रहा है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार राहु को नवग्रह में एक स्थान दिया गया है। दिन में राहुकाल नामक मुहूर्त (२४ मिनट) की अवधि होती है जो अशुभ मानी जाती है।


समुद्र मंथन के समय स्वरभानु नामक एक असुर ने धोखे से दिव्य अमृत की कुछ बूंदें पी ली थीं। सूर्य और चंद्र ने उसे पहचान लिया और मोहिनी अवतार में भगवान विष्णु को बता दिया। इससे पहले कि अमृत उसके गले से नीचे उतरता, विष्णु जी ने उसका गला सुदर्शन चक्र से काट कर अलग कर दिया। परंतु तब तक उसका सिर अमर हो चुका था। यही सिर राहु और धड़ केतु ग्रह बना और सूर्य- चंद्रमा से इसी कारण द्वेष रखता है। इसी द्वेष के चलते वह सूर्य और चंद्र को ग्रहण करने का प्रयास करता है। ग्रहण करने के पश्चात सूर्य राहु से और चंद्र केतु से,उसके कटे गले से निकल आते हैं और मुक्त हो जाते हैं।


भारतीय ज्योतिष के अनुसार राहु और केतु सूर्य एवं चंद्र के परिक्रमा पथों के आपस में काटने के दो बिन्दुओं के द्योतक हैं जो पृथ्वी के सापेक्ष एक दुसरे के उल्टी दिशा में (१८० डिग्री पर) स्थित रहते हैं। चुकी ये ग्रह कोई खगोलीय पिंड नहीं हैं, इन्हें छाया ग्रह कहा जाता है। सूर्य और चंद्र के ब्रह्मांड में अपने-अपने पथ पर चलने के अनुसार ही राहु और केतु की स्थिति भी बदलती रहती है। तभी, पूर्णिमा के समय यदि चाँद राहू (अथवा केतु) बिंदु पर भी रहे तो पृथ्वी की छाया पड़ने से चंद्र ग्रहण लगता है, क्योंकि पूर्णिमा के समय चंद्रमा और सूर्य एक दुसरे के उलटी दिशा में होते हैं। ये तथ्य इस कथा का जन्मदाता बना कि "वक्र चंद्रमा ग्रसे ना राहू"। अंग्रेज़ी या यूरोपीय विज्ञान में राहू एवं केतु को को क्रमशः उत्तरी एवं दक्षिणी लूनर नोड कहते हैं।


राहु पौराणिक संदर्भों से धोखेबाजों, सुखार्थियों, विदेशी भूमि में संपदा विक्रेताओं, ड्रग विक्रेताओं, विष व्यापारियों, निष्ठाहीन और अनैतिक कृत्यों, आदि का प्रतीक रहा है। यह अधार्मिक व्यक्ति, निर्वासित, कठोर भाषणकर्त्ताओं, झूठी बातें करने वाले, मलिन लोगों का द्योतक भी रहा है। इसके द्वारा पेट में अल्सर, हड्डियों और स्थानांतरगमन की समस्याएं आती हैं। राहु व्यक्ति के शक्तिवर्धन, शत्रुओं को मित्र बनाने में महत्वपूर्ण रूप से सहायक रहता है। बौद्ध धर्म के अनुसार राहु क्रोधदेवताएं में से एक है।


भारतीय ज्योतिष शास्त्रों में राहु और केतु को अन्य ग्रहों के समान महत्व दिया गया है, पाराशर ने राहु को तमों अर्थात अंधकार युक्त ग्रह कहा है, उनके अनुसार धूम्र वर्णी जैसा नीलवर्णी राहु वनचर भयंकर वात प्रकृति प्रधान तथा बुद्धिमान होता है, नीलकंठ ने राहु का स्वरूप शनि जैसा निरूपित किया है.


सामान्यतः: राहु और केतु को राशियों पर आधिपत्य प्रदान नही किया गया है, हां उनके लिये नक्षत्र अवश्य निर्धारित हैं. तथापि कुछ आचार्यों ने कन्या राशि को राहु के अधीन माना है, उनके अनुसार राहु मिथुन राशि में उच्च तथा धनु राशि में नीच होता है. मतान्तर से वृष के 20 अंश पर राहु परमोच्च तथा मिथुन में 0 से 20 अंश तक मूलत्रिकोण में होता है. गुरु शुक्र व शनि को राहु के मित्र, मंगल बुद्ध सम तथा सूर्य चंद्र को शत्रु माना गया है. राहु वृष में उच्च, मिथुन में मूलत्रिकोण राशि तथा कन्या में स्वराशि होता है.


राहु के नक्षत्र आर्द्रा स्वाति और शतभिषा है, इन नक्षत्रों में सूर्य और चन्द्र के आने पर या जन्म राशि में ग्रह के होने पर राहु का असर शामिल हो जाता है.


ऋषियों के अनुसार राहु का वर्ण नीलमेघ के समान है, यह सूर्य से १९००० योजन से नीचे की ओर स्थित है, तथा सूर्य के चारों ओर नक्षत्र की भांति घूमता रहता है. शरीर में इसे पिट और पिण्डलियों में स्थान मिला है, जब जातक के विपरीत कर्म बन जाते है, तो उसे शुद्ध करने के लिये अनिद्रा पेट के रोग मस्तिष्क के रोग पागलपन आदि भयंकर रोग देता है, जिस प्रकार अपने निन्दनीय कर्मों से दूसरों को पीडा पहुंचाई थी उसी प्रकार भयंकर कष्ट देता है, और पागल तक बना देता है, यदि जातक के कर्म शुभ हों तो ऐसे कर्मों के भुगतान कराने के लिये अतुलित धन संपत्ति भी देता है, इसलिये इन कर्मों के भुगतान स्वरूप उपजी विपत्ति से बचने के लिये जातक को राहु की शरण में जाना चाहिये, तथा पूजा पाठ जप दान आदि से प्रसन्न करना चाहिये. गोमेद इसकी मणिरत्न है, तथा पूर्णिमा इसका दिन है. अभ्रक इसकी धातु है.


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Tuesday, 11 August 2020

स्मार्त और वैष्णव में क्या अंतर है। जानिए रहस्य

Posted by Dr.Nishant Pareek
Smart or vaishnav me kya antar hai. Janiye rahasya


स्मार्त और वैष्णव में क्या अंतर है। जानिए रहस्य
इस बार स्मार्त सम्प्रदाय 11 अगस्त मंगलवार को और वैष्णव सम्प्रदाय 12 अगस्त बुधवार को जन्माष्टमी पर्व मनाएगा।
जन्माष्टमी अलग-अलग दिन मनाने की बात सुनकर कुछ लोग अचरज में पड़ जाते हैं। कुछ लोग स्मार्त व वैष्णव सम्प्रदाय के बारे में भी जानने की उत्सुकता व्यक्त करते हैं।

व्रत-उपवास आदि करने वालों को 'वैष्णव' व 'स्मार्त' में भेद का ज्ञान होना अतिआवश्यक है। हम यहां 'वैष्णव' व 'स्मार्त' का भेद स्पष्ट कर रहे हैं।
 
'वैष्णव'- जिन लोगों ने किसी विशेष संप्रदाय के धर्माचार्य से दीक्षा लेकर कंठी-तुलसी माला, तिलक आदि धारण करते हुए तप्त मुद्रा से शंख-चक्र अंकित करवाए हों, वे सभी 'वैष्णव' के अंतर्गत आते हैं।
 
'स्मार्त'- वे सभी जो वेद-पुराणों के पाठक, आस्तिक, पंच देवों (गणेश, विष्णु,‍ शिव, सूर्य व दुर्गा) के उपासक व गृहस्थ हैं, 'स्मार्त' के अंतर्गत आते हैं।

कई पंडित यह बता देते हैं कि  जो गृहस्थ जीवन  बिताते हैं वे स्मार्त होते हैं और कंठी माला धारण करने वाले साधु-संत वैष्णव  होते हैं जबकि ऐसा नहीं है जो व्यक्ति श्रुति स्मृति में विश्वास रखता है। पंचदेव अर्थात ब्रह्मा , विष्णु , महेश , गणेश , उमा को मानता है , वह स्मार्त हैं 

प्राचीनकाल में अलग-अलग देवता को मानने वाले संप्रदाय अलग-अलग थे। श्री आदिशंकराचार्य द्वारा यह प्रतिपादित किया गया कि सभी देवता ब्रह्मस्वरूप हैं तथा जन साधारण ने उनके द्वारा बतलाए गए मार्ग को अंगीकार कर लिया तथा स्मार्त कहलाये।

जो किसी वैष्णव सम्प्रदाय के गुरु या धर्माचार्य से विधिवत दीक्षा लेता है तथा गुरु से कंठी या तुलसी माला गले में ग्रहण करता है या तप्त मुद्रा से शंख चक्र का निशान गुदवाता है । ऐसे व्यक्ति ही वैष्णव कहे जा सकते है अर्थात वैष्णव को सीधे शब्दों में कहें तो गृहस्थ से दूर रहने वाले लोग।

वैष्णव धर्म या वैष्णव सम्प्रदाय का प्राचीन नाम भागवत धर्म या पांचरात्र मत है। इस सम्प्रदाय के प्रधान उपास्य देव वासुदेव हैं, जिन्हें छ: गुणों ज्ञान, शक्ति, बल, वीर्य, ऐश्वर्य और तेज से सम्पन्न होने के कारण भगवान या ‘भगवत’ कहा गया है और भगवत के उपासक भागवत कहलाते हैं। 

इस सम्प्रदाय की पांचरात्र संज्ञा के सम्बन्ध में अनेक मत व्यक्त किये गये हैं। 

‘महाभारत’के अनुसार चार वेदों और सांख्ययोग के समावेश के कारण यह नारायणीय महापनिषद पांचरात्र कहलाता है।

नारद पांचरात्र के अनुसार इसमें ब्रह्म, मुक्ति, भोग, योग और संसार–पाँच विषयों का ‘रात्र’ अर्थात ज्ञान होने के कारण यह पांचरात्र है।

‘ईश्वरसंहिता’, ‘पाद्मतन्त’, ‘विष्णुसंहिता’ और ‘परमसंहिता’ ने भी इसकी भिन्न-भिन्न प्रकार से व्याख्या की है।

‘शतपथ ब्राह्मण’ के अनुसार सूत्र की पाँच रातों में इस धर्म की व्याख्या की गयी थी, इस कारण इसका नाम पांचरात्र पड़ा। इस धर्म के ‘नारायणीय’, ऐकान्तिक’ और ‘सात्वत’ नाम भी प्रचलित रहे हैं।

प्रायः पंचांगों में एकादशी व्रत , जन्माष्टमी व्रत स्मार्त जनों के लिए पहले दिन और वैष्णव लोगों के लिए दूसरे दिन बताया जाता है । इससे जनसाधारण भ्रम में पड जाते हैं। दशमी तिथि का मान 55 घटी से ज्यादा हो तो वैष्णव जन द्वादशी तिथि को व्रत रखते हैं अन्यथा एकादशी को ही रखते है। इसी तरह स्मार्त जन अर्द्धरात्रि को अष्टमी पड़ रही हो तो उसी दिन जन्माष्टमी मनाते हैं। जबकि वैष्णवजन उदया तिथि को जन्माष्टमी मनाते हैं एवं व्रत भी उसी दिन रखते हैं।
जय श्रीमन्नारायण। 🙏🙏
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Sunday, 9 August 2020

Barah bhavo me shani ka shubh ashubh samanya fal or upay / बारह भावों में शनि का शुभ अशुभ सामान्य फल और उपाय

Posted by Dr.Nishant Pareek

Barah bhavo me shani ka shubh ashubh samanya fal or upay 



 बारह भावों में शनि का शुभ अशुभ सामान्य फल और उपाय 


शनि ग्रह के प्रति अनेक आखयान पुराणों में प्राप्त होते हैंशनिदेव को सूर्य पुत्र एवं कर्मफल दाता माना जाता है। लेकिन साथ ही पितृ शत्रु भी.शनि ग्रह के सम्बन्ध मे अनेक भ्रान्तियां और इस लिये उसे मारक, अशुभ और दुख कारक माना जाता है। पाश्चात्य ज्योतिषी भी उसे दुख देने वाला मानते हैं। लेकिन शनि उतना अशुभ और मारक नही है, जितना उसे माना जाता है। इसलिये वह शत्रु नही मित्र है।मोक्ष को देने वाला एक मात्र शनि ग्रह ही है। सत्य तो यह ही है कि शनि प्रकृति में संतुलन पैदा करता है, और हर प्राणी के साथ उचित न्याय करता है। जो लोग अनुचित विषमता और अस्वाभाविक समता को आश्रय देते हैं, शनि केवल उन्ही को दण्डिंत (प्रताडित) करते हैं। अनुराधा नक्षत्र के स्वामी शनि हैं।

फ़लित ज्योतिष के शास्त्रो में शनि को अनेक नामों से सम्बोधित किया गया है, जैसे मन्दगामी, सूर्य-पुत्र, शनिश्चर और छायापुत्र आदि.शनि के नक्षत्र हैं,पुष्य,अनुराधा, और उत्तराभाद्रपद.यह दो राशियों मकर, और कुम्भ का स्वामी है।तुला राशि में २० अंश पर शनि परमोच्च है और मेष राशि के २० अंश प परमनीच है।नीलम शनि का रत्न है।शनि की तीसरी, सातवीं, और दसवीं द्रिष्टि मानी जाती है।शनि सूर्य,चन्द्र,मंगल का शत्रु,बुध,शुक्र को मित्र तथा गुरु को सम मानता है। शारीरिक रोगों में शनि को वायु विकार,कंप, हड्डियों और दंत रोगों का कारक माना जाता है।

रोग - ज्योतिष में शनि ग्रह को कैंसर, पैरालाइसिस, जुक़ाम, अस्थमा, चर्म रोग, फ्रैक्चर आदि बीमारियों का जिम्मेदार माना जात है।

कार्यक्षेत्र - ऑटो मोबाईल बिजनेस, धातु से संबंधित व्यापार, इंजीनियरिंग, अधिक परिश्रम करने वाले कार्य आदि कार्यक्षेत्रों को ज्योतिष में शनि ग्रह के द्वारा दर्शाया गया है।

उत्पाद - मशीन, चमड़ा, लकड़ी, आलू, काली दाल, सरसों का तेल, काली वस्तुएँ, लोहा, कैमिकल प्रॉडक्ट्स, ज्वलनशील पदार्थ, कोयला, प्राचीन वस्तुएँ आदि का संबंध ज्योतिष में शनि ग्रह से है।

स्थान - फैक्टी, कोयला की खान, पहाड़, जंगल, गुफाएँ, खण्डहर, चर्च, मंदिर, कुंआ, मलिन बस्ती और मलिन जगह का संबंध शनि ग्रह से है।

जानवर तथा पशु-पक्षी - ज्योतिष में शनि ग्रह बिल्ली, गधा, खरगोश, भेड़िया, भालू, मगरमच्छ, साँप, विषैले जीव, भैंस, ऊँट जैसे जानवरों का प्रतिनिधित्व करता है। यह समुद्री मछली, चमगादड़ और उल्लू जैसे पक्षियों का भी प्रतिनिधित्व करता है।

जड़ी - धतूरे की जड़ का संबंध शनि ग्रह से है।

रत्न - नीलम रत्न शनि ग्रह की शांति के लिए धारण किया जाता है।

हिन्दू धर्म में शनि ग्रह शनि देव के रूप में पूजा जाता है। पौराणिक शास्त्रों में शनि को सूर्य देव का पुत्र माना गया है। शास्त्रों में ऐसा वर्णन आता है कि सूर्य ने श्याम वर्ण के कारण शनि को अपना पुत्र मानने से इंकार कर दिया था। तभी से शनि सूर्य से शत्रु का भाव रखते हैं। हाथी, घोड़ा, मोर, हिरण, गधा, कुत्ता, भैंसा, गिद्ध और काैआ शनि की सवारी हैं। शनि इस पृथ्वी में सामंजस्य को बनाए रखता है और जो व्यक्ति के बुरे कर्म करता है वह उसको दण्डित करता है। हिन्दू धर्म में शनिवार के दिन लोग शनि देव की आराधना में व्रत धारण करते हैं तथा उन्हें सरसों का तेल अर्पित करते हैं।

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