Tuesday, 10 November 2020

Mithun rashi ka sampurn parichay / मिथुन राशि का संपूर्ण परिचय

Posted by Dr.Nishant Pareek

Mithun rashi ka sampurn parichay




मिथुन राशि का संपूर्ण परिचय

मिथुन राशि के अंतर्गत आने वाले नामाक्षर निम्न हैः- का, की, कू, घ, ड., के, को, हा।

मिथुन राशिचक्र की तीसरी राशि है। इस राशि का प्रतीक स्त्री पुरूष का जोडा है। अतः यह द्विस्वभाव वाली राशि है। इसका विस्तार राशिचक्र के 60 अंश से 90 अंश तक है। इसका स्वामी बुध है। वायु तत्व वाली राशि है। इसके तीन द्रेष्काणों के स्वामी क्रमशः बुध - बुध, बुध - शुक्र, और बुध - शनि है। इसके अंतर्गत मृगशिरा के अन्तिम दो चरण, आद्र्रा के चारों चरण तथा पुनर्वसु के तीन चरण आते है। इन चरणों के स्वामी इस प्रकार है- मृगशिरा तृतीय चरणः मंगल- शुक्र। चतुर्थ चरणः मंगल- मंगल। आद्र्रा प्रथम चरणः राहु- गुरू। द्वितीय चरणः राहु- शनि। तृतीय चरणः राहु - शनि। चतुर्थ चरणः राहु- गुरू। पुनर्वसु प्रथम चरणः गुरू- मंगल। द्वितीय चरणः गुरू- शुक्र। तृतीय चरणः गुरू - बुध। इन चरणों के नामाक्षर क्रमशः इस प्रकार है- का, की, कू, घ, ड., के, को, हा।

त्रिशांश विभाजन में 0 से 5 अंश तक मंगल मेष के, 5 से 10 अंश तक शनि कुंभ के, 10 से 18 अंश तक गुरू धनु के, 18 से 25 तक बुध मिथुन के, तथा 25 से 30 अंश तक शुक्र तुला के है। 

जिन व्यक्तियों के जन्म समय निरयण चंद्र मिथुन राशि में संचरण कर रहा होता है, उनकी जन्म राशि मिथुन होती है। उन्हें गोचर में अपने फल इसी के अनुसार देखने चाहिये। जन्म के समय लग्न में मिथुन राशि होने से भी यह अपना प्रभाव दिखाती है। सायन सूर्य 22 मई से 21 जून तक मिथुन राशि में रहता है। यही अवधि शक संवत् के ज्येष्ठ मास की है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इन तिथियों में एक दो दिन का हेर फेर भी हो सकता है। जिन व्यक्तियों की जन्म तिथि इस समय के बीच में है, वे पश्चिमी ज्योतिष पर आधारित फलादेशों को मिथुन राशि के अनुसार देख सकते है। निरयण सूर्य लगभग 16 जून से 16 जुलाई तक मिथुन में रहता है। 

ग्रह मैत्री के अनुसार मिथुन राशि चंद्र, शुक्र, व शनि के लिये मित्र राशि, सूर्य के लिये सम राशि तथा मंगल और गुरू के लिये शत्रु राशि है। इस राशि में कोई ग्रह अपनी उच्च या नीच स्थिति में नहीं होता। गुरू के लिये यह अस्त राशि है। 

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प्रकृति और स्वभावः- 

सभी राशियों के जातकों में मिथुन जातकों को सबसे अधिक दुर्बोध माना जाता है। इस राशि को समझने के लिये इसके प्रतीक चिन्ह पर विशेष ध्यान देना चाहिये। मिथुन का प्रतीक स्त्री व पुरूष का जोडा है। जब व्यक्ति का एक ही मस्तिष्क आश्चर्यचकित करने में सक्षम होता है तो दो मस्तिष्क मिल जाये तो, और वो भी एक पुरूष और दूसरा स्त्री का, तो कहना ही क्या। स्त्री और पुरूष के संबंधों में जो भी रहस्य संभव है, वे सभी मिथुन व्यक्ति के मस्तिष्क में मिल सकते है। 

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मिथुन राशि चक्र की पहली वायु तत्व वाली राशि है। उसका स्वामी बुध देवकुल का पक्षधारी दूत है। उसके पास ऐसी पादुकाएं है, जिनके द्वारा वह पलभर में ही कहीं से भी कहीं पहुंच सकता है। यह पहली द्विस्वभाव राशि है। बुध शरीर में मस्तिष्क का प्रतिनिधित्व करता है। इस पृष्ठभूमि में मिथुन व्यक्ति को समझने का प्रयास किया जा सकता है। यह जातक मस्तिष्क प्रधान होता है। उसके एक मस्तिष्क में दो मस्तिष्क कार्य करते है - एक स्त्री का तथा दूसरा पुरूष का। वह बहुत कल्पनाशील होता है। कल्पना के पखों पर सवार होकर कहीं भी घूम आता है। उसके स्वभाव में विरोधाभास होता है। हमेशा दोराहे पर सवार रहता है। एक क्षण में गंभीर हो जाता है तो दूसरे ही क्षण मजाक करने लग जाता है। यह स्वभाव उसके यौन व्यवहार में भी दिखाई देता है। और उसमें भी उभयलिंगी अथवा समलिंगी प्रवृति मिल सकती है। मिथुन व्यक्ति का जीवन बैरोमीटर के पारे की तरह उतरता चढता रहता है। उसके लिये हर पल का एक अलग अस्तित्व होता है। उसके विचार पल पल में बदलते रहते है। इसलिये वह अपनी कही हुई बात से तुरंत पलट जाता है। 

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मिथुन राशि का स्वामी बुध, व्यक्ति को अनेक गुण प्रदान करता है- अनेक विषयों में रूचि, नीति में कुशल, दूसरे के मन की बात को जानना, दूरदृष्टि, बहुमुखी प्रतिभा आदि। उससे अधिक शीघ्रता से, उससे अधिक शालीनता से, उससे अधिक सफलता से काम करने वाला दूसरा कोई नहीं मिल सकता। शर्त एक ही है कि वह उस काम को करने का संकल्प ले। इसके जीवन की सबसे बडी कमी यही है कि एक ही काम पर वह ज्यादा दिन नहीं टिकता। मिथुन जातक बोलने में बहुत होशियार होता है। अपनी वाणी से वह सामने वाले का मन जीत लेता है। यदि इच्छा हो तो दूसरे की बात भी सुनता है और अपनी ज्यादा कहता है। वह खुद किसी की भी बात से सहमत नहीं होता। अपने किये गये वादे से भी मुकर जाता है। एक जगह टिक कर नहीं बैठता। जहां पैसा पास में हो और घूमने की सुविधा हो तो तुरंत उठकर चल देते है। उसे गति या चंचलता से प्यार है। यात्रा पसंद करता है। 

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काम पूरा होने के बाद भी वह उससे संतुष्ट नहीं होता। अपना ही सबसे बडा आलोचक होता है। परिणामस्वरूप वह एक नई चुनौती को पूरा करने का बोझ उठा लेता है। मिथुन व्यक्ति जीवन के मूल उद्देश्य अपने और दूसरों के जीवन को अधिक सरस, अधिक सुंदर बनाने का होता है। इसके लिये वह उन्हें मानसिक भोजन प्रदान करता है। बौ़िद्धक संतोष उसकी प्रेरक शक्ति है। कोई भी नई समस्या उठ खडी होने पर वह उसे तब तक जूझता रहेगा, जब तक उसकी जड तक नहीं पहुंच जाता। अपनी अभिव्यक्ति के लिये उसे साथियों और मित्रों की जरूरत होती है। 

मिथुन स्त्री, पुरूष से भिन्न नहीं होती। वह अपनी बुद्धि और चतुराई से वह पुरूषों को आकर्षित करने में सफल होती है। कभी कभी उसके बातूनी स्वभाव से कुछ परेशानियां भी हो जाती है। 

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मिथुन व्यक्ति को उन अवगुणों से भी विशेष सावधान रहना चाहिये जो यह द्विस्वभाव राशि उसके अंदर पैदा करती है। सबसे बडा अवगुण अहम् का है। विविधता की लालसा उसे चंचल और बेचैन बनाए रखती है। ऐसा व्यक्ति रोजाना के कामों को बिल्कुल भी पसंद नहीं करता। यदि करना भी पडे तो ऐसा दिखाता है कि मानों किसी जानवर को पिंजरे में कैद करके रखा हो। वह नाम वाले हर काम में आगे रहना चाहता है और पीछे बैठाने पर सोचता है कि उसका सही उपयोग नहीं किया जा रहा है। मिथुन जातक के लिये सबसे अधिक आवश्यक अपनी शक्तियों को विभिन्न दिशाओं में बिखरने न देना है।

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आर्थिक क्षेत्रः- 

आर्थिक क्षेत्र में भी मिथुन जातक लगभग हमेशा दो नावों पर सवार रहता है। वह ऐसे काम करना पसंद करते है, जिनमें वे रातों रात की करोडपति बन जाये। जैसे सट्टा, शेयर, कम्पनी प्रोमोटर आदि। इनमें नये खोजों से लाभ उठाते है। लेकिन इसमें उन्हें कितनी ही सफलता मिले, वे संतुष्ट नहीं हो पाते। परिणामस्वरूप अधिक पैसा कमाने के चक्कर में अपनी सीमा से बाहर कार्य करने लगते है और नुकसान उठाते है। इससे उनके आर्थिक जीवन में उतार चढान आता रहता है। 

बुध दिमाग पर नियंत्रण रखता है। इसलिये मिथुन जातक ऐसे कामों में अधिक सफल होते है, जिनमें बुद्धि की जरूरत ज्यादा हो। वाक्पटु होने के कारण वे कुशल कूटनीतिज्ञ और राजनीतिक सलाहकार भी बन सकते है। अपनी जिज्ञासु और अन्वेषण स्वभाव के कारण वे हर प्रकार के अनुसंधान कार्य में सफल हो सकते है। वे अच्छे पत्रकार, लेखक, भाषाविज्ञ, योजनाकार, आदि बन सकते है। यात्रा प्रिय होने के कारण वे व्यावसायिक एजेंट की भूमिका कुशलता से निभा सकते है। ये अच्छे वकील, उपदेशक, व्याख्याता, बन सकते है। निरंतर अभिव्यक्ति की खोज में रहने के कारण संगीत, चित्रकला, नृत्य आदि को भी अपनी आजीविका का माध्यम बनाते है। 

मिथुन जातक निम्न व्यवसाय करते हुये पाये जाते है-

लेखाकार, क्लर्क, व्यावसायिक एजेंट, पत्रकार, शिक्षक, व्याख्याता, वकील, डाक कर्मचारी, कलाकार, गाइड, फोटोग्राफर, परिवहन कर्मचारी, सचिव, निजी सहायक, खजांची, अनुवादक, साइकिल स्कूटर विक्रेता, स्टेशनरी विके्रता, इंजीनियरिंग ठेकेदार, संदेशवाहक, दूतावास अधिकारी, मंच वक्ता, शेयर बाजार के दलाल, कम्पनी प्रोमोटर आदि। प्रेम 

मैत्री, प्रेम , विवाह आदिः-

मिथुन जातक दोस्तों के बिना नहीं रह सकते। अपने संपर्क में आने वाले किसी भी अजनबी को वे अपनी वाणी से तुरंत अपना मित्र बना लेते है। वे अपने दोस्तों का सत्कार भी खूब करते है। उनके प्रति दया और उदारता रखते है। लेकिन यह सब तभी तक होता है जब तक वे लोग आंखों के सामने हो। नजरों से दूर होते ही वे उनके दिमाग से भी गायब हो जाते है। प्रेम  प्रसंगों में भी मिथुन जातक एक पहेली ही रहते है। एक पल में वे कसकर प्यार करते है तो दूसरे ही पल में वे छोड देते है। अनेक मिथुन व्यक्तियों के दो परिवार भी पाये जाते है। अपनी व्यवहार कुशलता से वे दोनों परिवारों को एक साथ निभाने में सफल भी होते है। मिथुन प्रेमी अपने प्रेम  में शायद ही कभी गंभीर होता हे। गहरा प्रेम  होने पर भी कोई अन्य बडी मुसीबत उसे भटका सकती है। वह दिल से नहीं, मस्तिष्क से प्रेम  करता है और उसका प्रेम  भी प्रायः सुविचारित होता है।

मिथुन पति हरजाई होते है और पत्नी के अलावा भी उनकी प्रेमिका होती है। इसका उनके वैवाहिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है। मिथुन पत्नियां भी परपुरूष के प्रभाव से शायद ही बच पाती है। भले ही वह दिल से अपने पति के प्रति निष्ठावान हो। उनके संबंध स्थायी नहीं रह पाते। तलाक के बहुत से मामले में केंद्र बिंदु मिथुन पत्नियां ही होती है। मिथुन जातक को ऐसे जीवनसाथी की आवश्यकता होती है, जो उसकी बौद्धिक रूचियों में उसका साथ दे सके। जो घर से बंधी न हो और पति का मुख खुलते ही उठकर चल दे। उसे अपनी रूचियां पति की रूचियों के अनुरूप बनानी होगीं और पति के हरजाईपन को अधिक गंभीरता से नहीं लेना चाहिये। जहां उसका हित होगा, वह स्वयं धरती पर आ जायेगा और वैवाहिक जीवन में संकट पैदा करने वाले अपने प्रेम प्रसंगों को समाप्त करने में एक क्षण भी नहीं लगायेगा। उसे शांति से समझाया जाना चाहिये। लगातार कुरेदने और उस पर दबाव डालने से प्रतिकूल परिणाम सामने आ सकते है। इससे परेशान होकर वह घर छोड सकता है। मिथुन माता पिता अपने बच्चों से प्यार करते हुये भी उनसे बंधकर नहीं रहना चाहते तथा उनको अपने उपर बोझ समझते है। 

स्वास्थ्य और खानपान:-

मिथुन जातक मस्तिष्क प्रधान होता है। अतः जहां स्वास्थ्य की बात आती है, वह मन के प्रभाव से नियंत्रित होता है। इस राशि के व्यक्ति शरीर से प्रायः पुष्ट नहीं होते। किन्तु उनके अंग अंग में चंचलता भरी होती है। उनकी आंखें बहुधा भूरी या नीली होती है। रंग गोरा या काला, दोनों ही हो सकते है। उनका कद लंबा और सीधा होता है। हाथ भी प्रायः लंबे होते है। नाक भी लंबी और तीखी होती है। टांगे पतली होती है और उनकी नसें दिखाई देती है। 

मिथुन व्यक्तियों को अधिकांश रोग दिमागी या मन से उत्पन्न होते है। मन प्रसन्न होता है तो वे रोग पीडा को भी चकमा दे देते है। यदि नहीं, तो हर प्रकार के स्नायु रोगों के शिकार हो सकते है। अत्यधिक परिश्रम से वे स्नायविक थकान महसूस करते है। तब उन्हें दवाओं से अधिक नींद, स्वच्छ हवा और उचित भोजन की आवश्यकता होती है। लेकिन अपने स्वभाव के अनुसार वे इस प्रकार की सलाह मानने से इंकार कर सकते है। इन्हें होने वाले प्रमुख रोगों में हकलाना, जिव्हा रोग, प्लूरिसी, निमोनिया जैसे फेफडे के रोग तथा सर्दी, जुकाम, ब्रोंकाइटिस आइसीनोफीलिया, जैसे श्वास रोग हो सकते है। मिथुन से छठा भाव वृश्चिक होने के कारण वे गुप्त रोगों से पीडित भी हो सकते है। 

दे्रष्काण, नक्षत्र, तथा त्रिशांश:- 

पहले द्रेष्काण में लग्न होने पर उस पर बुध का दुहरा प्रभाव रहता है। ऐसा जातक सदा हवा के घोडों पर सवार रहता है। यदि लग्न द्वितीय द्रेष्काण में हो तो जातक पर बुध के साथ साथ शुक्र का भी प्रभाव रहता है। बुध मस्तिष्क का ग्रह है और शुक्र कला तथा सौन्दर्य का प्रतीक है। ऐसे जातक में एक अच्छा कलाकार बनने की संभावना रहती है। तीसरे द्रेष्काण में लग्न होने पर उस पर बुध के साथ शनि का प्रभाव भी रहता है। शनि जन साधारण का प्रतीक है। ऐसा जातक प्रायः किसी ऐसे आंदोलन से जुड जाता है, जिसका संबंध आम जनता से हो। वह किसी शोध कार्य में प्रवृत हो सकता है। 

मिथुन राशि के अंतर्गत मृगशिरा के दो चरण, आद्र्रा के चारों चरण और पुनर्वसु के तीन चरण आते है। चंद्र या नामाक्षर मृगशिरा के तृतीय चरण में होने पर जातक में आवेग तथा परंपरा से विद्रोह की मात्रा में वृद्धि होती है। चैथे चरण में मंगल के साथ मंगल उस आवेग को और बढा देता है। जातक में स्वच्छंदता की प्रवृति बढ जाती है। आद्र्रा का पहला चरण जातक को कुछ बहिर्मुखी बनाता है। जबकि दूसरा चरण गंभीरता और तीसरा चरण उसमें नवीन खोज की या आंदोलन की प्रवृत्ति प्रदान करता है। आद्र्रा के चैथे चरण में गुरू बौद्धिकता को कम करके भावनात्मकता में वृद्धि करता है। पुनर्वसु का पहला चरण स्वच्छंदता और तीसरा चरण जातक को कलात्मक प्रवृतियों की ओर उन्मुख करता है। पुनर्वसु का तीसरा चरण उसे बौद्धिकता की तरफ ले जाता है। 

मंगल का त्रिशांश 0 - 5 अंश जातिका को पुत्रवती बनाता है। शनि का त्रिशांश 5- 10 अंश उसके लिये सर्वथा अनिष्ट कहा गया है। गुरू का त्रिशांश 10 - 18 अंश तक उसे पति में अनुरक्त बनाएगा। बुध का त्रिशांश 18 - 25 अंश जातिका को तेजस्विनी बनाता है। शुक्र का त्रिशांश 25 - 30 अंश उसे धन संपत्ति से सम्पन्न करेगा। 

विशेष:- 

मिथुन राशि का रंग तोते के समान हरा माना गया है। इसके स्वामी बुध का रंग दूर्वा श्याम या दूब की भांति हरा है। बुध का रत्न पन्ना है। मिथुन राशि पश्चिम दिशा की संकेतक है। इसका मूलांक 5 है। यह विविधता वाला अंक है। व्यक्ति के जीवन में प्रमुख भूमिका निभाता है। वारों में बुधवार इसका प्रतिनिधित्व करता है। 

मिथुन राशि निम्न वस्तुओं स्थानों तथा व्यक्तियों की संकेतक है- 

दीवारें, संदूक, सूटकेस, रेल, ट्राम, बस, कार, टैक्सी, विमान, पैराशूट, समाचार पत्र प्रकाशन, अखबारी कागज, रज्जुमार्ग, सूक्ष्मदर्शक तथा दूरदर्शक, कपास, हरा चना, तथा सभी हरी वस्तुएं। खलिहान, पहाडियां, पर्वत, खेलघर, भोजनकक्ष, विद्यालय, शिशुशालाएं आदि। प्रचारक, पर्यटक, दूत, पत्रकार, वकील, राजनयिक, शिक्षक, कलाकार, आदि। 


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Tuesday, 13 October 2020

Vrash rashi ke anya rashi walo se vivah sambandh kaise rahenge, janiye is lekh me./ वृष राशि के अन्य राशि वालों से विवाह संबंध कैसे रहेंगे, जानिये इस लेख मेंः-

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Vrash rashi ke anya rashi walo se vivah sambandh kaise rahenge, janiye is lekh me.


वृष राशि के अन्य राशि वालों से विवाह संबंध कैसे रहेंगे, जानिये इस लेख मेंः-

वृष - मेष :- 

अग्नि तत्व और जल तत्व की आवश्यकताओं और स्वभाव में इतनी भिन्नता है कि उनकी पटरी ठीक से बैठ पाना सरल नहीं है। दोनों में से किसी के झुकने के लिये तैयार न होने पर कठिनाई सामने आयेगी। मेष को नए नए उद्यम और चुनौतियां चाहिये। जबकि वृष जातक शांति और सुस्थिरता चाहते है। वृष जातकों की मंदगति और एक ही स्थान पर ठहरे रहने की प्रवृति पर मेष जातक अपना धैर्य खो बैैठते है।

यदि पति मेष राशि है और पत्नी वृष, तो पत्नी को समझ लेना चाहिये कि वह पति को अपनी मनमर्जी से झुका नहीं सकती है। लेन देन की भावना का अभाव दोनों की कमजोरी है। दोनों अपनी अपनी फायदा या सुख देखेंगे। यदि दोनों अपने अपने रूख पर अडे रहे तो ऐसा भी हो सकता है कि उनके बीच संभोग संबंध समाप्त हो जाये अथवा संभोग के समय लडाई झगडा हो। 

यदि पति वृष हो और पत्नी मेष हो तो भी दोनों के संबंध मधुर रहने की संभावना बहुत कम होती है। किसकी मर्जी चलेगी, इस बात पर दोनों में टकराव होता है। पत्नी अपने नये नये विचार पति पर थोपने का प्रयास करती है और पति को वह विचार समझ से परे लगते है। वह हर बात को तर्कपूर्ण तरीके से सोचना चाहता है। वह हर काम में सुरूचि भी खोजता है। भोजन बनाना तक उसके लिये कला का काम है। जिसमें उसकी पत्नी को अपनी सुरूचि का परिचय देना चाहिये। पत्नी के लिये इन सब बातों का कोई महत्व नहीं है और उसकी दिलचस्पी कहीं और ही रहती है। 

शारीरिक संबंधों में भी पत्नी पति से उससे कहीं अधिक अपेक्षा करेगा जितना वह उसे दे सकती है। पति के लिये यौन संतुष्टि सबसे महत्वपूर्ण है जबकि पत्नी को बाहय संतुष्टि के बिना यौन संबंधों में रस नहीं मिल सकता। 

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वृष- वृषः- 

वृष जातक स्थिर राशि में जन्म लेने के कारण परंपरावादी होते है। वे यथास्थिति बनाए रखना चाहते है। अतः दोनों की अच्छी पट सकती है। किन्तु दोनों में ईष्र्या और अधिकार की भावना होती है। यदि इन पर चोट पडे तो उनके शांत जीवन में तूफान आ सकता है। उनका जिद्दी स्वभाव भी आडे आ सकता है। तब वे एक दूसरे की हर गतिविधि को संदेह की दृष्टि से देखेंगे और उनमें तेज झगडा होगा। वृष जातक वृष जातिका की घर चलाने की सुचारू व्यवस्था से विशेष प्रभावित होगा। सोच समझकर पैसा खर्च करने और उसकी सहज व्यापारिक वृद्धि का भी वह कायल होगा। वृष महिला अतिथि सत्कार में बहुत कुशल होती है। वह एक बडे भोज का प्रबन्ध भी उतनी ही कुशलता से कर सकती है, जितनी कुशलता से दो मेहमानों के खाने का प्रबन्ध करती है। दोनों के संबंधों को प्रगाढ बनाने के लिये उसका यह गुण बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि अतिथि सत्कार उनके जीवन का एक आवश्यक अंग है। 

शारीरिक संतुष्टि की भूख दोनों में समान रूप से होती है। उनका आधा समय रसोई में ही निकल जाता है। बिना लाग लपेट का यौन जीवन उनके लिये महत्वपूर्ण है - एक दूसरे तक सीमित दो स्थूल व्यक्तियों का सुखी परिवार। अच्छे और बुरे गुणों में समानता के कारण यह जोडी उत्तम रहेगी या एकदम चैपट हो जायेगी। 

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वृष - मिथुन -

वृष सबसे अधिक पृथ्वी तत्व वाली राशि है। मिथुन वायु तत्व वाली राशि चंचल और परिवर्तनशील है। दोनों की मूल आवश्यकताएं आकांक्षाएं परस्पर विरोधी है। मिथुन में निरन्तर परिवर्तन तथा विविधता की भावना से स्थिरता चाहने वाली वृष परेशान हो सकती है। वृष के लिये मिथुन को रोके रखना प्रायः असंभव होगा। 

यदि पत्नी वृष है और पति मिथुन जातक है तो पत्नी को कलाओं में दिलचस्पी अपने तक ही सीमित रखनी चाहिये। जब तक उसमें उच्च कोटि की कला प्रतिभा नहीं होगी, तब तक पति पर उसके कला पे्रम का कोई प्रभाव नहीं पडेगा। उसे घरेलू ढंग की पत्नी भी पसंद नहीं आती। मिथुन जातक ऐसी पत्नी चाहता है जो धुंआधार सामाजिक जीवन में भी उसका साथ दे सके। वृष जातिका का अतिथि सत्कार का गुण उसे अच्छा लग सकता है। किन्तु ऐसी पत्नी ईष्र्यावश उसके अन्य महिलाओं से मिलने जुलने को पसंद नहीं करेगी। उसकी दिमागी भूख को समझे बिना वह उस पर अधिकार जताने का प्रयास करेगी। जिससे उनके संबंधों में तनाव पैदा होगा। वृष पत्नी की अपने साज श्रृंगार पर ध्यान देने और संगठन की प्रतिभा का प्रदर्शन करने की मिथुन पति अवश्य सराहना करेगा। कभी कभी वह उसके चरित्र बल की प्रशंसा भी करेगा। जब दुनिया उसे धकियाती दिखाई देती है तो वह पत्नी की गोद में ही जाकर शरण लेगा। इससे उनके शिथिल दाम्पत्य को कुछ बल मिलेगा। 

पति पत्नी के गिरगिट जैसे रंगों से बहुत परेशान रहेगी। एक दिन वह शरारती बालक जैसा व्यवहार करेगा तो दूसरे दिन पशु जैसा। उसे विविधता चाहिये, जो यदि घर में नहीं मिलती तो वह बाहर तलाश करता है। यदि पति वृष जातक है और पत्नी मिथुन है तो कभी कभी मौज मस्ती की तरंग में वेे एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो सकते है। बाद में पति की मंद और परंपरागत चाल से तथा अपने रंग ढंग में कोई परिवर्तन न करने की जिद से पत्नी उखड जायेगी। इसे वह अदूरदर्शिता समझेगी। कभी कभी घर भी उसे अच्छा लग सकता है किन्तु घर ही उसके लिये पूरी दुनिया नहीं होती। वह खुला जीवन जीना चाहती है। पति चाहेगा कि वह सारा समय घर में ही बिताये। और उसके लिये सुख सुविधायें जुटाए। ऐसा न होने पर संबंधों में दरार आने का खतरा होता है। 

वृष व्यक्ति में यौन समागम की प्रबल इच्छा होती है। लेकिन अपनी बिना लाग लपेट वाली पहल व ईष्र्यालु स्वभाव के कारण वह मिथुन पत्नी को अपने से दूर कर देगा। पे्रमाचार के मामले में दोनों की पहल में इतनी भिन्नता होगी कि उनके लिये एक दूसरे को संतुष्ट कर पाना प्रायः असंभव होगा। 

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वृष - कर्क - 

पृथ्वी तत्व और जल तत्व के बीच सहज आकर्षण होता है। दोनों में अनेक समानताएं होती है। दोनों के लिये भावनाओं तथा प्रेम का भारी महत्व है। दोनों मूल रूप से परंपरावादी है। अतः परस्पर विरोधी रूचियों के कारण संघर्ष की संभावना कम ही है। भावनाओं का उबाल आने पर समझदारी और तर्क से उसे शांत किया जा सकता है। लेन देन की भावना से इस संबंध को अच्छा बनाया जा सकता है। 

यदि पत्नी वृष जातिका है और पति कर्क जातक है तो पति पत्नी के मन में यह बात बैठा सकता है कि वह उसके जीवन में सब कुछ है। यही आशा वह पत्नी से करता है। दोनों में घरेलूपन की भावना मिलती है और उनका अधिकांश समय घर में ही निकलता है। कर्क जातक सदैव कल्पनाशील रहता है। वह पत्नी में देवी की छति देखना चाहता है। अतः उसकी दुर्बलता सामने आने पर उसे बहुत सदमा सा लगता है। वह अपने में ही खोया रहने लग जाता है। वृष महिला बहुत व्यवहार कुशल नहीं होती। पति को कुरेदकर बाहर निकालने के उसके प्रयासों का उल्टा ही परिणाम होता है। लेकिन वृष महिला में ममता भरपूर होती है। पति के बुरे दिनों में अपनी ममता का सहारा देकर वह उसे भारी प्रात्साहन दे सकती है। 

इस संबंध में समय और समय और परिश्रम से सुधार हो जाता है। उनके यौन जीवन पर शाम की घटनाओं का भारी प्रभाव पडता है। यदि कोई दुखद घटना घट जाये तो पति के लिये प्रेमाचार असंभव हो जाता है। उस समय पत्नी उसे कुरेद कर नाराजगी ही पैदा करेगी। यदि पति वृष है और पत्नी कर्क हो तो घरेलूपन की भावना दोनों के जीवन को सुखी बनाये रखेगी। सबसे बडा संकट नीरस दिनचर्या के फलस्वरूप उबाउपन आने का है। उनका यौन जीवन भी मशीन जैसा बन सकता है। अतः कल्पना का सहारा लेकर जीवन में विविधता और सरसता लाने का प्रयास करना जरूरी है। 

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वृष - सिंह - 

दो इतनी दृढ इच्छा शक्ति वाली राशियों में पृथ्वी तत्व का अग्नि तत्व से मेल टकराव और विरोध पैदा कर सकता है। सिंह जातक चाहता है कि उस पर पूरा ध्यान दिया जाये। वृष में में यह गुण विद्यमान है। वृष जातक प्रायः सिंह के दबदबे को सहन करता है और फिर एक दिन उलट कर वार कर सकता है। सिंह के के लम्बे चैडे विचार परंपरावादी वृष को हैरान कर सकते है। सामान्यतः यह एक बेमेले जोडी है। यह संबंध आमतौर से अन्धाकर्षण से शुरू होता है, जो अधिक आगे तक शायद ही बढ पाता है। 

सिंह जातक में ऐसे अनेक गुण होते है जो वृष जातिका को आकर्षित किये बिना और पे्रमजाल में फंसाए बिना नहीं रहते। जैसे उसकी शक्ति, सौहार्दता, उदारता। सिंह जातक वृष जातिका की सुरूचि तथा सहज वित्तीय योग्यता से प्रभावित होता है। उसकी वाक्पटुता से आकर्षित हो वह उसकी कमियों को नहीं देख पाता। फिर एक दिन वृष जातिका ऐसा महसूस कर सकती है कि उसका सिंह पति उस पर भारी पड रहा है। इससे उसमें उपेक्षा की भावना उत्पन्न होने लगती है और उसकी विरोधी स्वभाव वाली नारी जाग जाती है। पति उसको सभी सांसारिक सुख सुविधाएं प्रदान करता है, लेकिन इससे पत्नी भी भावनात्मक भूख नहीं मिटती है। यह भूख उनके यौन जीवन में प्रवेश कर जाती है। पति को लगता है कि पत्नी ने उसके विरूद्ध असहयोग की लडाई छेड दी है। यह स्थिति न आ जाये कि इसके लिये पति पत्नी को अपनी मौज मस्ती को कायम रखना होगा। 

यदि पत्नी सिंह है और पति वृष है तो इससे अधिक जिददी लोगों की जोडी मिलना असंभव है। यह संबंध तभी बनाना चाहिये, जब दोनों एक दूसरे को बदलने का प्रयास न करने का निश्चय ले। निजी रायों के बारे में दोनों की जिद उनके सुखी जीवन में सबसे बडी बाधा होगी। पति कर्जे के नाम से ही घबरायेगा और पत्नी का हाथ इतना खुला होगा कि यदि उस पर अंकुश न लगा हो तो पति को क्रोधी रूप देखने को मिलेगा। लेकिन मेहमानों के सत्कार में दोनों की रूचि रहेगी। वृष पति में यौन की बलवती इच्छा रहेगी, लेकिन पत्नी की यौन की भूख भी कम नहीं होगी, अतः इस संबंध में समस्याएं पैदा होने की संभावना नहीं है। उनका यौन जीवन बिना किसी लाग लपेट वाला होगा और अत्यंत संतोषजनक भी हो सकता है। किन्तु असली झगडा शयन कक्ष के बाहर होगा। दोनों का स्वभाव एक दूसरे के विरोधी है। 

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वृष - कन्या - 

       पृथ्वी तत्व के पृथ्वी तत्व से मेल का अर्थ है कि अनेक बातों में दोनों का समान दृष्टिकोण है। दोनों व्यवहार कुशल, यथार्थवादी, सक्षम और व्यवस्थाप्रिय है। किन्तु उनकी भावनात्मक प्रकृति में काफी अन्तर है। वृष में गहरी अधिकार भावना और आवेश पाया जाता है। जबकि कन्या में भावनाएं अधिक नियंत्रित रहती है। दोनों के लक्ष्यों में काफी समानता है। दोनों ही भौतिक सफलता और सुरक्षा चाहते है। यदि धैर्य से काम ले तो यह एक आदर्श जोडी बन सकती है। 

यदि पत्नी वृष जातिका हो और पति कन्या जातक हो तो उनके जीवन में बच्चों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। यह जोडी आदर्श होने पर भी किसी को एकदम पूर्ण नहीं कहा जा सकता है। पति आफिस में या घर पर देर तक कठोर परिश्रम करता है और पत्नी उसके काम की सराहना करना तो दूर, उलटे उसके दावा करती है कि वह उससे बेहतर काम केवल आधे समय में कर देती है। इसी प्रकार जब पति अपने स्वभाव के अनुसार पत्नी के किसी काम की कडी आलोचना करता है तो वृष जातिका अपने दोषों सहज स्वीकार नहीं करती। यह दोनों के बीच तनाव का कारण बनता है। बहुत दिनों बाद उसकी समझ में आ जाता है कि ऐसी आलोचना पर ध्यान नहीं देना चाहिये। कन्या जातकों की अपनी एक चर्या और जीने के नियम होते है। वृष जातिकाओं में भी यह प्रवृति पाई जाती है। जिससे दोनों की पटरी बैठ जाती है। कन्या जातक के मन में कु वर्जनाएं होती है। जिससे दोनों की पटरी बैठ जाती है। कन्या जातक के मन कुटिलता होती है। लेकिन वृष जातिका उसके अधिक से अधिक गुणों को प्रकाश में लाने में समर्थ होती है। कन्या राशि का व्यक्ति यौन के विषय में भी अधिक सक्रिय नहीं होता। किन्तु वृष जातिका उसकी वर्जनाओं को दूर कर उसकी यौन वृत्तियां जगा देती है। 

 यदि पति वृष हो और पत्नी कन्या हो तो भी अनेक बातों पर दोनों का समान दृष्टिकोण होने से उनके बीच ठोस संबंधों का आधार तैयार होता है। दोनों पूरे विस्तार के साथ अपने भविष्य की योजना बनाते है। कन्या जातिका यद्यपि वृष जातिका की भांति गृहकार्य में दक्ष नहीं होती। परंतु वह घर तो कुशलता पूर्वक चलाती है। पति की सुख सुविधाओं का ध्यान रखती है। भावनात्मक दृष्टि से यद्यपि वृष जातक की भावनाएं अधिक गहरी होती है। तथापि कालान्तर में वह कन्या जातिका में अधिक गहरी भावनाएं पैदा करने में सफल होता है। उसकी ईष्र्या तनाव का कुछ कारण हो सकती है। किन्तु कन्या जातिका उसे इसके लिये अवसर नहीं देती। मतभेद का एक कारण पति का आलसीपन हो सकता है। जिसे पत्नी प्रायः क्षमा नहीं करती है। दूसरा खतरा उनके जीवन में गतिरोध और नीरसता आ जाने का है। 

इस जोडी का यौन जीवन भी बहुत सक्रिया रहेगा। वह अधिक लाग लपेट वाला नहीं होगा। पत्नी में इतनी बुद्धि अवश्य होगी कि पति के किसी सुझाव का विरोध न करे। पति पत्नी दोनों एक दूसरे के लिये जीने का प्रयास करे। 

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वृष - तुला - 

 पृथ्वी तत्व और वायु तत्व में कोई मेल नहीं है, किन्तु दोनों राशियों का स्वामी शुक्र ही है। अतः यह संबंध भावनाओं पर निर्भर करेगा, जिसमें सौन्दर्य भावना की परख भी है। दोनों राशियों शांति और प्रेम से रहना चाहती है, अतः कोई पक्ष विवाद में पडना नहीं चाहेगा। कूटनीति कुशल तुला जातक जिददी वृष जातक से नीति पूर्वक निभा ले जा सकता है। दोनों को आनंद और भोग चाहिये। जिसके लिये बजट में व्यवस्था करनी होगी। 

इसके बाद भी यदि पत्नी वृष है और पति तुला है तो नित्य जीवन में पति पत्नी को उसकी सहन शक्ति की सीमा से अधिक नाराज कर सकता है। एक सप्ताह वह अपने काम में इतना व्यस्त रहता है कि उसे पत्नी के अस्तित्व तक का भान नहीं रहता और दूसरे सप्ताह वह पूरे आलस में डूब जाता है और कोई काम नहीं करता। वृष जातिका योजनाबद्ध तरीके से अपना जीवन चलाना चाहती है, जबकि तुला जातक एक घंटे से आगे की नहीं सोचता। उसे कुरेदने का अर्थ दोनों के बीच तीव्र झडप ही हो सकता है।  तुला जातक में एक हरजाईपन पाया जाता है। जिसका कोई इलाज नहीं हो सकता। इसके पीछे आत्म तुष्टि का ही कारण रहता है। वृष जातिका की ईष्र्या इसे सहने की अनुमति नहीं देती। फिर भी तुला जातक आम तौर पर उसके उबाल को पचा जाता है। प्रारंभ में प्रबल यौनाकर्षण के कारण उनकी व्यक्तित्व संबंधी समस्याएं उभर कर सामने नहीं आ पाती। धीरे धीरे यह आकर्षण कम होता जाता है। लेकिन उसके रहते वे तरह तरह के परीक्षणों के दौर से गुजरते है। 

यदि पति वृष जातक है और पत्नी तुला है तो केवल कलाएं और सौंदर्य बोध उन्हें आपस में बांध कर रखने के लिये पर्याप्त नहीं होगा। पति पत्नी को घर में रखना चाहता है। कुछ समय तक पत्नी को यह दर्शन अच्छा लग सकता है। परंतु अधिक दिन तक यह नहीं चल सकता। उसका स्वतंत्रता प्रेमी मन शीघ्र भटकने लगता है। पति पत्नी के बीच तनाव बढता जाता है। पति को पत्नी के चरित्र पर संदेह होने लगता है। धन की दृष्टि से भी दोनों के विचारों में बहुत अंतर होता है। पति में सुरक्षा की भावना मुख्य होती है तथा वह भविष्य के लिये बचाकर रखना चाहता है। पत्नी केवल तात्कालिक आवश्यकताओं की बात सोचती है और व्यय की अधिक चिन्ता नहीं करती। तुला जातिका वृष जातक को पति पाकर आरंभ में तो बहुत प्रसन्न रहती है। वृष जातक की यौन की भूख प्रबल होती है। बाद में पत्नी अनुभव करती है कि पति केवल अपनी भूख मिटाने में ही विश्वास रखता है। जबकि उसे स्वयं मानसिक उत्तेजना चाहिये। उसके मन में विद्रोह जन्म ले सकता है और वह उससे सहयोग से इन्कार कर सकता है। यदि पति अपने रूख पर अडा रहा तो वह अन्यत्र भी संतुष्टि की तलाश कर सकती है। दोनों की जोडी काफी तूफानी रहने की संभावना है। 

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वृष - वृश्चिक - 

पृथ्वी तत्व की प्रायः जल तत्व के साथ पटरी बैठ जाती है। किन्तु राशिचक्र में ये दो राशियां एक दूसरे के आमने सामने होने के कारण प्रारंभ में उनमें प्रबल आकर्षण उत्पन्न होता है। बाद में आकर्षण घटने पर इसका उलटा भी हो सकता है। दोनों राशियां ईष्र्या तथा अधिकार की भावना से ग्रस्त है। अतः उनमें परस्पर विश्वास होना आवश्यक है। गहन भावनाओं के कारण कभी कभी तूफानी पे्रम या घृणा संबंध जन्म ले सकते है। 

यदि पत्नी वृष और पति वृश्चिक हो तो पति का पत्नी की निष्ठा पर बहुत अधिक बल होता है। उसके लिये सारी दुनिया बहुत क्रूर, अविश्वसनिय व शत्रुतापूर्ण दिखाई देती है। वह घर से ही उसका सुधार करना चाहता है। जिसे उसकी वृष पत्नी शायद पसंद नहीं करती। यदि वह उस पर अंकुश लगाने का प्रयास करती है तो उसमें जलन, ईष्र्या, तथा अधिकार की भावना प्रबल हो जाती है। कभी कभी वह क्रूर भी हो सकता है। ये ही विशेषताएं वृष पत्नी के स्वभाव में होती है। अतः उनके संबंध नाटकिय हो सकते है। यदि वे एक दूसरे को बहुत चाहते है तो इस तनाव को पार कर सकते है। और रोज रोज के झगडों को मजाक में लेजा सकते है। वृष पत्नी यदि आग और तूफान का जीवन पसंद करती है तो उसे ऐसा ही पति चाहिये। 

यौन जीवन में दोनों ही बहुत संवेदनशील होते है। लेकिन उनकी अपनी अपनी धारणाएं होती है और दोनों चाहते है कि दूसरा उसके आगे झुके। खाने पीने में दोनों ही अति करते है। जिसका उनके यौन जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है। 

यदि पति वृष और पत्नी वृश्चिक हो तो दोनों के जिद्दी स्वभाव से अनेक समस्याएं पैदा हो सकती है। उनमें जरा सी बात को लेकर खींचतान हो सकती है कि कौनसी फिल्म देखनी चाहिये। किन्तु उनके बीच आर्थिक समस्याएं उठना संभव नहीं है। क्योंकि दोनों ही पैसे को सोच समझकर खर्च करने वाले होते है। उनके बीच तनाव का एक अन्य कारण यह भी हो सकता है कि जहां वृश्चिक पत्नी में भावना पक्ष प्रबल रहता है, वहीं वृष जातक में यथार्थ प्रबल होता है। फिर भी एक पक्की गृहस्थी की चाह दोनों को जोडे रख सकती है। उनका यौन जीवन भी अस्थिर रहेगा। दोनों में यौन की भूख प्रबल रहती है। ऐसे अवसर कम ही आते है, जब दोनों की यह भूख एक ही समय पर जागे। 


वृष - धनु - 

यह बहुत ही बेमेल जोडा होता है। वृष सबसे स्थिर राशियों में है और वृष जातक जीवन सुस्थिर होने पर ही स्वयं को सुरक्षित समझ सकता है। उसकी घरेलू तथा अधिकार भावना भी धनु जातक की स्वतत्रता भावना से टकरा सकती है। धनु जातक चंचल और परिवर्तन पसंद होता है। वह दूर की उडानें भरता है जिसके लिये उसे विशाल मानसिक और भौतिक क्षितिज चाहिये। वृष जातक के लिये इसे सहन कर पाना बहुत मुश्किल होता है। वृष स्त्री और धनु पुरूष की मित्रता तो निभ सकती है लेकिन इससे आगे पे्रम संबंध स्थापित होने पर कठिनाइयां आरंभ हो जायेगी। धनु जातक के लिये पे्रम को अधिक समय तक निभा पाना कठिन होता है। उसमें खिलाडीपन और दुस्साहस की भावना होती है। जबकि वृष स्त्री उसके साथ घर से बाहर निकलने को प्रस्तुत नहीं होती। धनु जातक वृष स्त्री की बात सुन सकता है उसकी आलोचना सहन कर सकता है। कुछ सीमा तक अपने में परिवर्तन ला सकता है। किन्तु उसका पालतु नहीं बन सकता। यौन संबंधों में भी वृष स्त्री के लिये धनु जातक के विचित्र असामान्य सुझावों को स्वीकार करना संभव नहीं होगा। 

यदि पति वृष हो और पत्नी धनु हो तो आरंभ में विरोधी प्रवृतियों के कारण उनके बीच आकर्षण पैदा हो सकता है। किन्तु बाद में यही आकर्षण संघर्ष का कारण बन जायेगा। एक दिन पति महसूस करेगा कि उसकी पत्नी बहुत स्वच्छंद स्वभाव की है और पूर्ण रूप से उसकी नहीं हो सकती। उधर पत्नी पति के परंपरावादी स्वभाव से वह उबने लगती है। पति की ईष्र्या से दोनों के संबंध टूटने प्रारंभ हो जायेंगे। दोनों के आर्थिक दृष्टिकोण में भी भारी अंतर रहेगा। 


वृष - मकर - 

पृथ्वी तत्व और पृथ्वी तत्व का यह मेल अच्छा रहेगा। सुरक्षा भावी वृष जातक को मकर जातक का व्यावहारिक दृष्टिकोण और धैर्यपूर्वक काम करने की प्रवृति रास आयेगी। दोनों परंपरावादी और उत्तरदायित्व निभाने वाले है। बाहरी भोगों को उनमें से कोई वास्तविक महत्व प्रदान नहीं करता। अतः जीवन कभी कभी उनके लिये काफी गंभीर हो उठेगा। 

यदि पत्नी वृष है और पति मकर है तो दोनों के बीच सहज अनुभूति विद्यमान रहती है। जिससे वे एक दूसरे की भावनाओं को आशा - निराशाओं को और परिहास भावना को समझ सकते है। दोनों स्थायी, सुरक्षित और प्रेमपूर्ण गृहस्थ जीवन पसंद करते है। प्रारंभ में मकर पति अपने को ठीक से व्यक्त नहीं कर पाता। किन्तु कालांतर में वृष पत्नी समझ लेती है कि उसकी भावनाओं को उसके कार्यों से समझना चाहिये, चिकनी चुपडी बातों से नहीं। 

पति की संभोग इच्छा में बहुत उतार चढाव आता रहता है। एक दिन उसमें प्रबल संभोग का वेग रहता है तो दूसरे दिन वह एकदम निढाल हो जाता है। उसके यौन संबंधों पर बाहरी तनावों का भारी प्रभाव पडता है। वृष पत्नी को चाहिये कि उसके तनाव की अनुभूति कर उसके साथ चर्चा करे। इससे उसमें कमी होगी। इस जोडी का जीवन ठीक तरह निभाने की काफी संभावना है। यही बात उस अवस्था में होगी जब पति वृष हो और पत्नी मकर हो। शारीरिक आकर्षण उनके व्यक्तित्व के अंतर को कम कर देगा। दोनों एक दूसरे की रूचियों में दिलचस्पी लेना सीखेंगे। वे पुरातत्व की वस्तुएं एकत्र कर सकते है। क्योंकि दोनों की अतीत में कुछ न कुछ दिलचस्पी होगी। बागवानी में या घर से बाहर छुट्टियां बिताने में भी उनकी रूचि हो सकती है। खतरा यही है कि वे घर में इतने बंध जायेंगे कि बाहरी दुनिया से बिल्कुल कट जायेंगे। 

यौन संबंधों में यह मकर स्त्री के लिये सर्वोत्तम रहेगा। मकर पति अन्य राशि पतियों की अपेक्षा उसमें अधिक यौन भावना जगा सकता है और वह अपने पति को संतुष्ट करना सीख सकती है। 


वृष और कुंभ - 

यह एकदम भिन्न स्वभाव वाली दो अत्यंत हठी राशियों का मेल है। वृष जातक कुंभ जातक के रहस्यमय स्वभाव को समझने में विफल रहेगा। जब कुंभ जातक कुछ स्वतंत्रता या अलगाव चाहेगा तब वृष जातक उससे चिपकने का प्रयास करेगा। दोनों मेें किसी एक को झुकना पडेगा। कुंभ जातक में अनेक व्यक्तियों को प्रेम करने की सहज भावना होती है। जबकि वृष जातक अपनी भावनाओं में एकांगी होता है। जहां तक हो सके वृष स्त्री को कुंभ पुरूष से विवाह संबंध नहीं बनाने चाहिये। कुंभ जातक परस्पर विरोधी औपचारिकता में विश्वास न करने वाला होता है। वृष जातिका के लिये महत्वपूर्ण सुरक्षा तथा भौतिक साधन उसके लिये कोई महत्व नहीं रखते है। वह अपनी बुद्धि प्रखर करने के लिये काम करना पसंद करता है। और इसके लिये अपने कार्य क्षेत्र में बार बार परिवर्तन भी करता है। पत्नी के भावनात्मक उबाल का उस पर कोई प्रभाव नहीं होता। वह मतभेदों पर ठण्डे दिमाग से और ईमानदारी से चर्चा करना चाहता है। 

जब वह अपने मित्रों की समस्याएं हल करने का या सुधार कार्यों में लगने का प्रयास करता है तो वृष पत्नी के मन में ईष्र्या जाग उठती है। लेकिन उसकी कोई सुनवाई नहीं होती। कुंभ जातक समय की पाबंदी बिल्कुल पसंद नहीं करता और पत्नी को उसके इस स्वभाव के साथ निर्वाह किए बिना कोई चारा नहीं। कुंभ पति के जीवन में यौन का अधिक महत्व नहीं होता। यद्यपि वह उससे दूर नहीं भागता। वृष जातिका को इससे चिढ लग सकती है। वह नहीं चाहती कि दुनिया भर की समस्याएं उसके शयनकक्ष तक में घुस आये। पति के लिये उसकी यौन की भूख अत्यधिक हो सकती है। 

यदि पति वृष जातक है और पत्नी कुंभ हो तब भी उनके दृष्टिकोणों में मौलिक अंतर के कारण उनके संबंध सफल होने की आशा बहुत कम है। पति घर की चहारदीवारी में बंद हो सकता है और पत्नी बाहर किसी प्रदर्शन या जुलूस में भाग ले रही होती है। पति प्रबल कामेच्छा से पीडित हो रहा होता है और पत्नी बाहरी दुनिया के विचारों में खोई रहती है। रूपये पैसे को खर्च करने के प्रश्न पर भी पति पत्नी के बीच चिक चिक चलती रहती है। स्थिति में सुधार न होने पर पति अपनी संतुष्टि के लिये अन्य सहारा तलाश सकता है और पत्नी को अपनी व्यस्तता के कारण इस बात का पता नहीं लगता है। जब पता चलता है, तब तक पानी सर से उपर चला जाता है। 


वृष - मीन - 

पृथ्वी तत्व और जल तत्व का यह मेल बहुत अनुकूल रह सकता है। इन राशियों के स्वामी शुक्र और वरूण में कोई टकराव नहीं है। वृष जातक तथा मीन जातक दोनों सौन्दर्य, कला, आनंद, भोग आदि को पसंद करने वाले है। वृष व्यावहारिक है जबकि मीन प्रायः बादलों में विहार करता है। इनका मेल यथार्थवादी और स्वप्नदर्शी का मेल है। जब उनके बीच समस्याएं पैदा होती है तो भावनाओं का वेग स्पष्ट चिंतन को ढक लेता है।  

पत्नी वृष हो और पति मीन हो तो पत्नी को आरंभ में ऐसा लगता है कि पति उसकी हर बात मानने को तैयार है। बाद में उसे पता चलता है कि एक क्षण वह कुछ चाहता है और दूसरे ही क्षण उससे विपरीत मांग रखता है। पति अपने अतिरिक्त किसी दूसरे की राय सुनना पसंद ही नहीं करता। जब समस्याएं खडी हो जाती है तो मीन पति उन पर समझदारी से चर्चा करने की बजाय पीछा छुडाकर भागता है और उम्मीद करता है कि वह समस्या स्वयं ही हल हो जाये। तनाव बढने पर वह किसी शांत स्थान की तलाश करता है। अपने गम भुलाने के लिये नशा करने लगता है। निरंतर दो विरोधी विचारधाराओं में झूलते रहने के कारण वह कोई भी निर्णय करने में असमर्थ रहता है। वृष पत्नी को इसके लिये तैयार रहना चाहिये। 

यौनसंबंधों में मीन पति अपनी वृष पत्नी की इच्छाओं के प्रति बहुत संवेदनशील रहता है औरउसे प्रसन्न करने का पूरा प्रयास करता है। इस पर भी यदि वह विफल रहे और पत्नी की आलोचना का शिकार बने तो शयया से उठकर चल देता है। 

यदि पति वृष और पत्नी मीन हो तो पत्नी का रोमांस प्रिय मन पति के यथार्थवाद से टकरायेगा। दूसरे की समस्याओं में स्वयं को उलझा लेने की उसकी प्रवृति से कठिनाइयां पैदा हो सकती है। विशेषकर जहां रूपये पैसे का सवाल होता है। जिस पर भी दया आ जाये, वह उसकी आर्थिक सहायता के लिये तैयार रहती है। व्यावहारिक पति को यह कैसे सहन हो सकता है ? यदि पत्नी की वृत्ति का उसके गृहस्थ जीवन पर प्रभाव पडता हो तब भी वृष पति की ईष्र्या और जिद आडे आ सकती है। पत्नी के स्वतंत्र होने के प्रयास से उसके पौरूष को चोट पहंुचती है। इससे स्थिति कभी कभी अत्यन्त तनावपूर्ण हो उठती है। यौन जीवन में भी ऐसी समस्याएं आ सकती है। जब पत्नी रोमांटिक मूड में हो और पति का प्रेम करने का ढंग एकदम पशु समान हो तो पत्नी की संवेदनशीलता हो आघात लगता है। कठिनाई यह है कि वृष पति किसी भावनात्मक परिवर्तन को स्वीकार नहीं करता और पत्नी की ओर से चमत्कार की आशा लगाए रहता है। 


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Saturday, 26 September 2020

Vrish rashi ka parichay / वृष राशि का संपूर्ण परिचय

Posted by Dr.Nishant Pareek

 Vrish rashi ka Parichay


वृष राशि का संपूर्ण परिचय

वृष राशि के अंतर्गत आने वाले नामाक्षर निम्न हैः- ई, ऊ, ए, ओ, बा, बी, बू, बे, बो।

राशि चक्र में वृष राशि दूसरे क्रम पर आती है। इसका प्रतीक बैल है। बैल स्वभाव से परिश्रमी और बहुवीर्यवान होता है। सामान्य रूप से वह शांत होता है, लेकिन क्रोध आने पर वह बहुत उग्र हो जाता है। उस समय उसे नियंत्रण करना कठिन होता है। 

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वृष राशि का विस्तार राशिचक्र के तीस अंश से साठ अंश तक कुल तीस अंश का होता है। इसका स्वामी ग्रह शुक्र है। इसके तीन द्रेष्काणों के स्वामी क्रमशः शुक्र- शुक्र, शुक्र- बुध, तथा शुक्र-शनि होते है। इसके अंतर्गत कृत्तिका नक्षत्र के तीन चरण, रोहिणी के चार चरण, तथा मृगशिरा के पहले दो चरण आते है। इन चरणों के स्वामी क्रमशः कृतिका द्वितीय चरण- सूर्य शनि,तृतीय चरण - चंद्र शनि, चतुर्थ चरण - सूर्य गुरू, रोहिणी प्रथम चरण- चंद्र मंगल, द्वितीय चरण - चंद्र शुक्र, तृतीय चरण- चंद्र बुध, चतुर्थ चरण - चंद्र चंद्र। मृगशिरा प्रथम चरण - मंगल सूर्य, द्वितीय चरण- मंगल बुध, इन चरणों के नामाक्षर क्रमशः ई, ऊ, ए, ओ, बा, बी, बू, बे, बो है। 

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त्रिशांश विभाजन में प्रथम पांच अंश वृष के, पांच से बारह अंश तक कन्या के, बारह से बीस अंश तक मीन के, बीस से पच्चीस अंश तक मकर के, तथा पच्चीस से तीस अंश तक वृश्चिक राशि के है। 

जिन व्यक्तियों के जन्म के समय निरयण चंद्र वृष राशि में संचरण कर रहा होता है, उनकी जन्म राशि वृष मानी जाती है। उन्हें गोचर के अपने फलादेश इसी राशि के अनुसार देखने चाहिये। जन्म के समय वृष राशि होने से भी यह अपना प्रभाव दिखाती है। 

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प्रकृति और स्वभावः-

वृष पृथ्वी तत्व वाली स्थिर राशि है। पंचम त्रिकोण वृष कन्या मकर की यह पहली राशि है। किन्तु इसके स्वामी शुक्र का संबंध जल तत्व से है। इसलिये वृष जातक उपर से पृथ्वी की भांति गंभीर तथा जल की भांति शांत भले ही दिखाई दें, परंतु उसके अहम् पर जरा सी चोट लगते ही या उनकी इच्छा के विरूद्ध कोई काम होता है तो ये बैल की तरह नथुने फुलाकर फुफकारने लगते है। वृष काल पुरूष का दूसरा भाव है। जो कंठ का प्रतिनिधित्व करती है। अतः अपनी इच्छा अनिच्छा व्यक्त करने में वे कंठ शक्ति का पूरा प्रयोग करते है। 

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वृष पुरूषों के कन्धे आमतौर पर चैडे, गर्दन मोटी तथा माथा चैडा होता है। महिलाएं प्रायः उन्नत उरोजों तथा छोटे हाथ पैरों वाली होती है। प्रौढावस्था में उन पर मोटापा चढनें की प्रवृति देखने को मिली है। वृष जातक स्थिर और दृढ स्वभाव के तथा काम के प्रति भारी लगन वाले होते है। उनमें भारी शारीरिक व मानसिक सहन शक्ति रहती है। जब तक संकल्प रहता है तब तक कितना भी तनाव सह सकते है। धीरे धीरे अपना काम करते रहते है। स्वभाव से जिद्दी होते है। बार बार परिवर्तन पसंद नहीं करते। शांतिपूर्ण तरीके से जीवन जीना पसंद करते है। अकस्मात कोई परिवर्तन आने पर वे परेशान हो जाते है। उनके लिये विरोधियों या परिस्थितयों से समझौता करना कठिन होता है। इसके कारण उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना भी करना पडता है। 

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वृष जातक बहुत सामाजिक होते है। मित्र बांधवों का सत्कार करने में उनको विशेष आनंद मिलता है। वे सुख और विलास का जीवन पसंद करते है। सौन्दर्य, कला और संगीत से भी उनका गहरा प्रेम होता है। वे सुंदर वातावरण में रहना चाहते है। बागवानी में रूचि रखते है। कलात्कम साज सज्जा में निपुण और हर वस्तु को करीने से रखने वाले होते है। उनमें नाटकीय प्रदर्शन की गहरी समझ होती है। अवसर के अनुकूल जीवन के मंच पर वे किसी भी भूमिका को सफलता से निभा सकते है। सफल संगीतज्ञों, अभिनेताओं, तथा कलाकारों में अनेक वृष राशि वाले है।  

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वृष जातकों का प्रेमी स्वभाव उनमें अधिकार की भावना भी पैदा करता है। इससे ईष्र्या और द्वेष की भावना का भी जन्म हो सकता है। प्रायः इसके पीछे कोई तर्कसंगत कारण नहीं होता। अपने प्रेम पात्र के लिये बडे से बडे बलिदान को करने से भी नहीं चूकते। किंतु जिनसे घृणा करते है, उन्हें जीवनभर क्षमा नहीं कर पाते। कभी कभी इसका ज्वार उतरने पर पछताते है। थोडी सी सहानुभूति या दया दिखाने पर पिघल जाते है। सारा गुस्सा भूल जाते है। लोग उनकी इस कमजोरी का भरपूर फायदा उठाते है और उनको मूर्ख बनाते है। 

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आर्थिक क्षेत्र:-

वृष राशि के जातक यर्थाथवादी होते है तथा आदर्शो में विश्वास नहीं रखते है। आदर्श उनके लिये धन कमाने या व्यापार में लाभ कमाने का साधन होते है। उनमें धन कमाने और सम्पत्ति जमा करने की प्रबल इच्छा रहती है। उनमें अपने प्रिय पात्रों की आर्थिक सहायता करने की भावना भी रहती है। कभी कभी इसका उन्हें कटु अनुभव मिलता है। ऐसे जातक अच्छे सरकारी कर्मचारी, सेना या नौसेना में उच्च अधिकारी, अच्छी नर्स या डाक्टर बनते है। महिलाएं आमतौर पर सम्पन्न घरों में विवाह करती है। वे अच्छी व्यावसायिक योग्यता और संगठन शक्ति का परिचय देती है। वे प्रायः ऐसे व्यवसाय अपनाती है जिनमें उपायोगिता की प्रमुखता हो, किन्तु उनका कलापे्रम उसमें भी झलकने लगता है। 

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निम्न व्यवसायों में वृष जातक विशेष सफलता प्राप्त करते है- प्रसाधन सामग्री, आभूषण, विलासी वस्तुएं, साहूकार, खजांची, सटोरिया, जुआरी, घुडदौड, किसानी, बागवानी, अभिनेता, फिल्म निर्माता, दर्जी, पेंटर, साज सज्जा करने वाले, बीमा एजेंट, बस मालिक, दूध और उससे जुडे व्यवसाय, धन्धे, आयकर या बिक्री कर विभाग आदि। आमतौर पर वे वास्तव से कहीं अधिक अमीर समझे जाते है। उनके हर काम में दिखावा अधिक होता है।

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मैत्री, प्रेम , विवाह आदिः

वृष जातक अत्यंत निष्ठावान मित्र होते है। शुक्र प्रेम  का ग्रह है, अतः उनमें प्रेम भावना की कोई कमी नहीं रहती। फिर भी वृष पृथ्वी तत्व राशि होने के कारण वे शीघ्र भावावेश में आने वाले नहीं होते। वे काफी सोच समझकर जीवन साथी के विषय में निर्णय लेते है। किंतु एक बार निर्णय लेने पर उस पर अडिग रहते है। उसे प्राप्त करने में कोई कसर नहीं छोडते। वे प्रायः प्रेम जाल में भी फंसते रहते है। ऐसा होने पर वे अपने पे्रमपात्र के प्रति अन्त तक समर्पित रहते है। 

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वृष राशि के पुरूष और स्त्रियों में यौवन के लक्षण शीघ्र ही प्रकट होने लगते है। कभी कभी वे शीघ्र विवाह कर लेते है। ऐसा करना उनके लिये प्रायः हितकर नहीं होता। ऐसे समाजों में जहां तलाक और पुनर्विवाह प्रचलित है, ऐसी जातिकायें एक से अधिक विवाह भी करती है। किन्तु ऐसा बहुत कम होता है। वृष जातिकाऐं पति से भी अधिक अपने के प्रति समर्पित होती है। तलाक की बात उनके दिमाग में बहुत मुश्किल से घुस पाती है। हर परिस्थिति में उनके मन में अपने पति की देखभाल करने और उसे संरक्षण प्रदान करने की भावना रहती है। यह विचित्र बात है कि वृष जातक यद्यपि अपने सामाजिक जीवन में दिखावट पसंद करते है तथापि पे्रम प्रदर्शन के मामले में उनकी इस प्रवृति का न जाने कहां लोप हो जाता है। बच्चों को अवश्य बहुत प्यार करते है। और इस प्यार का एक अंश जीवनसाथी को भी मिल जाता है। इसलिये वृष जातकों के जीवन में बच्चों का भारी महत्व होता है। यदि अन्य कोई बाधा न हो तो वृष व्यक्ति अधिक संतान वाले भी होते है। सब मिलकर पे्रम और कलाप्रियता उनके जीवन का मूलमंत्र होता है। 

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स्वास्थ्य और खानपानः- 

वृष जातकों का शरीर आमतौर पर गठीला और मोटापा लिये हुये होता है। वे मध्यम उंचाई के होते है अथवा अन्य परिजनों की तुलना में नाटे भी हो सकते है। शुक्र ग्रह उन्हें अपार जीवनी शक्ति प्रदान करता है। इससे वे यांत्रिक तथा श्रमसाध्य कार्यों में उपयुक्त रहते है। उन्हें दर्द भी कम महसूस होता है और वे शारीरिक अक्षमता से हार नहीं मानते है। उनकी शक्ति का उपयोग रचनात्मक कार्यों में करना आवश्यक है। आलस और आत्मरति उनके स्वास्थ्य के दो सबसे बडे शत्रु होते है। बीमार होने पर वे बहुत दिनों तक किसी को पता भी नहीं लगने देते। लेकिन उनके पुनः स्वस्थ होने में भी अधिक समय लगता है। वृष जातकों को आमतौर पर टोंसिल, डिप्थीरिया, पायरिया, जैसी गले व गर्दन के रोग होते है। बुढापे में जलोदर रोग होने की संभावना होती है। इन्हें मिर्गी के दौरे भी पड सकते है। अथवा सिर की ओर बडी मात्रा में रक्त बहने से पक्षाघात भी हो सकता है। अन्य बीमारियां जैसे कब्ज, फुंसी, मुंहासे, आंख में पीडा, गुर्दे व जनन अंग में गडबडी आदि रोग जिनके वे शिकार हो सकते है। 

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वृष जातक प्रायः भोजन के प्रिय होते है। वे मद्यपान की ओर प्रवृत भी होते है। वे मिठाई के भी शौकीन होते है। वस्तुतः भोजन और काम उनकी दो सबसे बडी कमजोरियां होती है। ये ऐसी पत्नियों से ही प्रसन्न होते हैं जो इन दो बातों में इन्हें संतुष्ट कर सके। वृष जातिकाओं के समय का एक बडा भाग रसोईघर में व्यतीत होता है। 

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द्रेष्काण , नक्षत्र, तथा त्रिशांशः- 

वृष राशि के पहले द्रेष्काण पर दुगने शुक्र का प्रभाव रहता है। इस द्रेष्काण में लग्न की स्थिति होने पर जातक में वृष की प्रवृतियां विशेष रूप से दिखाई देती है। मध्य दे्रष्काण में लग्न की स्थिति होने पर उस पर शुक्र के साथ बुध का भी प्रभाव होता है। बुध भौतिक प्रवृतियों को कुछ सीमा तक कम करता है और जातक में मानसिक प्रवृतियां उभरती है। इससे जातक में अधिक आशावाद आएगा और वह अंतर्मुखी होने के साथ साथ कुछ बहिर्मुखी होने का प्रयास करेगा। तीसरे द्रेष्काण  में लग्न होने पर उस पर शुक्र के साथ साथ शनि का भी प्रभाव होगा जो जातक को अधिक गंभीर बनायेगा। 

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वृष राशि के अंतर्गत कृतिका नक्षत्र के तीन चरण, रोहिणी के चारों चरण तथा मृगशिरा के पहले दो चरण आते है। कृतिका के दूसरे तथा तीसरे चरण में सूर्य और शनि का संयुक्त प्रभाव जातक को अधिक गंभीर बनाएगा। जबकि चतुर्थ चरण में सूर्य और गुरू का संयुक्त प्रभाव उसमें आशावाद का संचार करेगा। रोहिणी का प्रथम चरण चंद्र मंगल के प्रभाव में है। वह जातक में मानसिक अस्थिरता ला सकता है। दूसरा चरण चंद्र शुक्र के प्रभाव से जातक को अधिक सौन्दर्यबौधी व कलाप्रिय बनाएगा। तीसरा चरण चंद्र बुध के प्रभाव से उसकी मानसिक प्रवृतियों को तीव्र करेगा। चैथा चरण दुगने चंद्रमा के प्रभाव में होने से उसके मन में उतार चढाव की प्रवृति रहेगी। मृगशिरा का पहला चरण मंगल व सूर्य के प्रभाव से जातक को अधिक जिद्दी व दम्भी बनायेगा। दूसरा चरण मंगल व बुध के प्रभाव से उसके मस्तिष्क में विचित्र विचार पैदा करेगा। 

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वृष राशि की स्त्री के लिये शुक्र का त्रिशांश 0-5 डिग्री उसे सुंदर और लोकप्रिय बनायेगा। बुध का त्रिशांश 5-12 डिग्री उसे कलाओं तथा संगीत में निपुण बनाता है। गुरू का त्रिशांश 12 - 20 डिग्री होने पर स्त्री सच्चरित्र और पुत्रवती होती है। शनि का त्रिशांश 20 - 25 डिग्री होने पर उसके पुनर्विवाह की संभावना अधिक होती है। और मंगल का त्रिशांश 25 - 30 डिग्री होने पर उसमें कलह की प्रवृति पैदा होती है। 

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विशेष:-

वृष राशि का वर्ण सफेद है। इसका स्वामी शुक्र का रंग चितकबरा सफेद कहा है। इसका रत्न हीरा और उपरत्न जरकन, ओपेल, स्फटिक आदि है। यह राशि दक्षिण दिशा की स्वामी है। इसका मूलांक 6 है। यह अंक कलात्मक अभिव्यक्ति वाला अंक है। वृष जातकों के जीवन में यह अंक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वारों में यह राशि शुक्रवार का प्रतिनिधित्व करती है। वृष राशि निम्न तत्वों की संकेतक हैः-

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सफेद फूल, समुद्री व्यापार, गोधन, जल जीव, सिले हुये वस्त्र, फल, रत्न आदि। अस्तबल, गोशालाएं, फर्नीचर की दुकानें, घर से दूर के चारागाह, वन, साफ किये गये क्षेत्र, निकटस्थ पेड, पर्वत आदि। वेदपाठी ब्राहमण, वैयाकरण, खनक, कुम्हार, पुजारी, ज्योतिषी, राजा, धनिक, योगी, गाडीवान, कृषक, अधिकारीगण, संगीतकार, पे्रमी, आदि।  


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Friday, 18 September 2020

Mesh rashi ke anya rashi walo se vivah sambnadh kaise rahenge / मेष राशि के अन्य राशि वालों से विवाह संबंध कैसे रहेंगे, जानिये इस लेख मेंः-

Posted by Dr.Nishant Pareek

Mesh rashi ke anya rashi walo se vivah sambnadh kaise rahenge ?


मेष राशि के अन्य राशि वालों से  विवाह संबंध कैसे रहेंगे, जानिये इस लेख मेंः-

मेष - मेष:- 

अग्नि तत्व का अग्नि तत्व से संबंध अनुकूल तो है किंतु आग के हद से अधिक बढ जाने की आशंका रहती है और कभी कभी वातावरण में गहरा तनाव भी पैदा हो सकता है। शांति और संतोष की आशा करना बहुत अधिक है। दोनों एक दूसरे पर हावि होने का प्रयास कर सकते है। जो तनाव उत्पन्न करते है। आवश्यकता होने पर दोनों एक दूसरे का जमकर पक्ष लेते है। इस जोडे के जीवन में उबाउपन कभी नहीं आयेगा। क्योंकि दोनों में से कोेई शांति से बैठने वाला नहीं है।  यदि दोनों के बीच किसी बात को लेकर विवाद पैदा हो गया तो यह विवाद तब तक जारी रहेगा जब तक उनमें से कोई एक हथियार नहीं डाल देता। इस जोडे के साथ एक खतरा यह भी है कि शारीरिक आकर्षण का ज्वार बहुत जल्दी उतर सकता है। तब दोनों विवाहेत्तर संबंधों में शांति खोजने का प्रयास कर सकते है जो उनके जीवन को असहनीय बना देता है। तब पे्रम का स्थान उतनी ही नफरत ले लेगी। 

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मेष - वृष:- 

अग्नि तत्व और जल तत्व की आवश्यकताओं और स्वभाव में इतनी भिन्नता है कि उनकी पटरी ठीक से बैठ पाना सरल नहीं है। दोनों में से किसी के झुकने के लिये तैयार न होने पर कठिनाई सामने आयेगी। मेष को नए नए उद्यम और चुनौतियां चाहिये। जबकि वृष जातक शांति और सुस्थिरता चाहते है। वृष जातकों की मंदगति और एक ही स्थान पर ठहरे रहने की प्रवृति पर मेष जातक अपना धैर्य खो बैैठते है।

यदि पति मेष राशि है और पत्नी वृष, तो पत्नी को समझ लेना चाहिये कि वह पति को अपनी मनमर्जी से झुका नहीं सकती है। लेन देन की भावना का अभाव दोनों की कमजोरी है। दोनों अपनी अपनी फायदा या सुख देखेंगे। यदि दोनों अपने अपने रूख पर अडे रहे तो ऐसा भी हो सकता है कि उनके बीच संभोग संबंध समाप्त हो जाये अथवा संभोग के समय लडाई झगडा हो। 

यदि पति वृष हो और पत्नी मेष हो तो भी दोनों के संबंध मधुर रहने की संभावना बहुत कम होती है। किसकी मर्जी चलेगी, इस बात पर दोनों में टकराव होता है। पत्नी अपने नये नये विचार पति पर थोपने का प्रयास करती है और पति को वह विचार समझ से परे लगते है। वह हर बात को तर्कपूर्ण तरीके से सोचना चाहता है। वह हर काम में सुरूचि भी खोजता है। भोजन बनाना तक उसके लिये कला का काम है। जिसमें उसकी पत्नी को अपनी सुरूचि का परिचय देना चाहिये। पत्नी के लिये इन सब बातों का कोई महत्व नहीं है और उसकी दिलचस्पी कहीं और ही रहती है। शारीरिक संबंधों में भी पत्नी पति से उससे कहीं अधिक अपेक्षा करेगा जितना वह उसे दे सकती है। पति के लिये यौन संतुष्टि सबसे महत्वपूर्ण है जबकि पत्नी को बाहय संतुष्टि के बिना यौन संबंधों में रस नहीं मिल सकता। 

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मेष - मिथुन:

अग्नि का वायु के साथ मेल ठीक बैठता है। मिथुन जाताकों की हाजिर जवाबी मेष जातकों की संघर्षशील भावना का जोड सिद्ध होती है। दोनों विविधता, कर्मठता और नई नई बातों की खोजों को पसंद करते है। जिससे दोनों की रूचियां समान रहती है और उनका जीवन उबाउ नहीं हो पाता। लेकिन इन संबंधों को स्थायी बनाने के लिये दोनों ओर से काफी लेन देन की आवश्यकता होती है। 

यदि पति मेष जातक हो और पत्नी मिथुन जातिका हो तो पत्नी पहले तो ऐसे पुरूष के चरित्र की दृढता, निद्र्वन्द्वता, आत्मविश्वास, पे्रम या व्यापार के मामले में शीघ्र निर्णय और नई नई योजनाओं के लिये उसकी पहल से काफी प्रभावित होती है। ये बातें उसे अपने व्यक्तित्व के अतुल्य ही लगती है। लेकिन पति शीघ्र ही उस पर हावि होने लगती है। जब इस नये अनुभव का नशा उतरने लगती है तो पत्नी उबने लगती है। रूचियों में भिन्नता से उसकी निराशा और भी बढ जाती है। पति को कला के प्रति पत्नी की रूचि अच्छी नहीं लगती और पत्नी को पति खिलाडीपन पसंद नहीं आता। किसी किसी दिन दोनों में तू तू मैं मैं भी हो जाती है। लेकिन वे अधिक समय तक उसे याद नहीं रखते। 

मेष जातक का पे्रम प्रदर्शन का तरीका भी मिथुन जातिका के लिये बहुत अधिक हो सकता है और वह उसके प्रति उदासीन हो सकती है। यदि यही स्थिति अधिक काल तक चलती रही तो पति पत्नी को ठंडी भी समझ सकता है। मेष पति के लिये मिथुन पत्नी की मानसिकता को समझना कभी संभव नहीं है। परिणामस्वरूप उनके बीच यौन समस्यायें पैदा हो सकती है और उनके संबंधों में दरार पड सकती है। बहस से बात और बिगड सकती है। 
यदि पत्नी मेष जातिका है और पति मिथुन जातक हो तो पत्नी को अपने अंदर संतुलन और धैर्य की गहरी भावना लाने की जरूरत होगी। यह काम उसके लिये सरल नहीं है। पति के क्षण क्षण बदलते मूडों से वह उलझन में पड सकती है। पति का भव्य मिलनसार और दिलचस्प रूप उसे आकर्षित कर सकता है, किन्तु उस पर हावी की अपनी भावना के कारण वह उसे विद्रोही भी बना सकती है। 

मिथुन पति को सबसे अधिक आवश्यकता मानसिक भोजन की होती है। बांध के रखना उसके लिये मरने जैसा है। यौन संबंधों में भी पति को नित नवीनता चाहिये। मेष पत्नी में इतनी बुद्धि नहीं होती कि वह पे्रम में नित नये प्रयोग या आसन कर सके। इसलिये मिथुन पति उससे उबने लगता है।  

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मेष - कर्क:- 

अग्नि और जल मिलकर समस्याऐं पैदा कर सकते है। कर्क जातक संवेदनशील होता है और मेष जातक के मुंहफटपन से उसे चोट पहंुच सकती है। मेष जातक को कर्क जातकों की संवेदनशीलता और भावुकता बिल्कुल नहीं भाती। एक व्यक्तित्व एकदम सीधा सपाट हो और दूसरा इतना जटिल, तो फिर उनके बीच मधुर संबंधों की बात सोचना ही व्यर्थ है। 

यदि पति मेष जातक है तो पत्नी कर्क जातिका, तो पत्नी के कुछ समझ पाने से पहले ही पति उस पर पूरी तरह हावी हो लेता है। शीघ्र ही पत्नी अपने जीवन मूल्यों के अंतर को समझने लगती है। पति को नए नए क्षेत्र चाहिये और पत्नी को शान्तिपूर्ण जीवन। पत्नी को प्यार में जलन अनुभव होने लगती है और वह सोचने लगती है कि यह आग कब तक कायम रहे सकेगी। पति भी महसूस करने लगता है कि वह वासना में अंधा हो गया था और पत्नी उसका साथ नहीं दे सकती। पत्नी की भावनाओं को न तो वह समझ सकता है और न समझने का प्रयास करता है। कर्क पत्नी को रोमांस और प्यार भरी पहल चाहिये, जिसका मेष पति में एकदम अभाव होता है। संतुष्टि नहीं मिलने पर पति उत्पीडन का भी सहारा लेने लगता है। 

यदि पत्नी मेष जातिका है और पति कर्क जातक हो तो पत्नी को अपने पति को समझने में लंबा समय लगता है। उसके उपर एक रक्षा कवच होता है और अंदर एक अत्यंत संवेदनशील हदय, जिसे आसानी से चोट पहुंचा सकती है। कर्क पति अपने विचारों, सपनों, अपनी पुस्तकों व संगीत से चिपका रहता है। यहां तक कि मेष पत्नी इन्हें अपनी सौत समझने लगती है। इनमें उसकी कोई रूचि नहीं रहती। 

कर्क पति एक पे्रमी और एक रक्षक पति की भूमिका निभाना चाहता है। वह चाहता है कि उसकी पत्नी में नारी के से गुण हो। कहे भले ही न, लेकिन यौन संबंधों का मुख्य उददेश्य उसकी दृष्टि में एक बडा परिवार बढाना होता है। मेष पत्नी भला इसे कैसे पसंद कर सकती है। 

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मेष - सिंह:-

यदि दोनों में से कोई भी एक दूसरे पर हावी होने का प्रयास न करे तो अग्नि और अग्नि का यह मेल काफी उत्साहवर्धक हो सकता है। सिंह जातक मेष जातक की गतिशीलता और पहल को सराहेगा तथा मेष जातक सिंह जातक के लंबे चैडे विचारों, सत्ता और उदारता, के रौब में नहीं आयेगा। दोनों राशियां बहिर्मुखी और जीवन से पूर्ण है। अतः संबंध बहुत धूम धडाके वाला रहेगा। 

मेेष पति अपने आत्मविश्वासी और संघर्षशील स्वभाव से सिंह पत्नी के मन में भारी आकर्षण और सम्मान पैदा कर सकता है। चिंता उसे पति के क्रोधी स्वभाव से हो सकती है। दोनों अपने अपने अहम में डूबे रहते है। पत्नी चाहती है कि पति सदा उसकी प्रशंसा करे। और पति चाहता है कि उसके व्यवसाय में पत्नी उसे प्रात्साहित करती रहे। जब उनके अहम् को चोट लगती है तो वे उग्र हो उठते है। फिर उनमें नाटकिय झगडे शुरू हो जाते है। उनसे बचने के लिये पत्नी को कभी कभी पति को विजयी होने का अहसास करा देना चाहिये। दोनों ही संघर्ष को पसंद करते है। अतः उनके जीवन में वाद विवाद की प्रमुख भूमिका होती है। पति को पत्नी की महत्वकांक्षा पर कोई आपत्ति नहीं होती। बस, वह यही चाहता है कि पत्नी की महत्वकांक्षा उससे या उसकी महत्वकांक्षा से आगे नहीं बढ पाये। दोनों ही पूरी सुख सुविधाऐं पसंद करते है। अतः आर्थिक समस्याएं पैदा होने पर उनके जीवन को बहुत कठिन बना सकती है।  उनके स्वभाव की उग्रता उनके यौन संबंधों पर भी प्रभाव डालती है। अतः अपने पे्रम को जीवित रखने के लिये उन्हें काफी समझदारी से काम लेना चाहिये। 

यदि पत्नी मेष जातिका है और पति सिंह जातक हो तो भी दोनों के संबंध धूमधडाके वाले ही होंगे। कठिनाई पति की इस भावना से होगी कि उसकी निरंतर प्रशंसा की जाये और उसे घर का स्वामी समझा जाये। मेष पत्नी अधिक प्रदर्शन में विश्वास नहीं करती। उसे चापलूसी से प्रेम भी पसंद नहीं होता। विशेषकर जब पति की चापलूसी करने वाली कोई अन्य सुंदर महिला हो। अतः ऐसी समझदार मेष पत्नियां स्वयं यह भूमिका निभाकर अपने पति को वश में कर सकती है। इसके बदले में पति पत्नी की बेचैनी को और उसकी मानसिक भूख को चतुराई से शांत करता है। यौन संबंधों में पति पत्नी खूब खुलेपन का परिचय देते है। 

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मेष - कन्या:- 

मेष अग्नि तत्व वाली राशि है तथा कन्य पृथ्वी तत्व वाली राशि है। दोनों के स्वभाव में आकाश पाताल का अंतर है। मेष जातक किसी काम के करने के ढंग और विस्तार की अधिक चिंता नहीं करता, जबकि कन्या जातक की ये स्वाभाविक प्रवृति होती है। अतः यह संबंध घातक हो सकता है। 

यदि मेष पति है और सिंह पत्नी है तो ऐसा पति वर्तमान में जीना पसंद करता है। जबकि पत्नी की एक आंख भविष्य पर लगी होती है। पति धन की बिल्कुल भी परवाह नहीं करता है। वह ये मानकर चलता है कि धन तो कहीं न कहीं से आ ही जायेगा। अपने काम को भी वह मन लगाकर तभी करता है जब उसकी रूचि हो। अतः उसके जीवन में उतार चढाव आते रहते है। इसके विपरीत कन्या पत्नी को हमेशा भविष्य की और आर्थिक सुरक्षा की चिंता रहती है। वह ऐसे काम पसंद करती है जिनमें कडी मेहनत भले ही हो, लेकिन स्थायित्व और सुरक्षा हो। पत्नी यदि पति से कठोर वचन कहती है तो पति प्रायः हंसकर टाल देता है। लेकिन जब बात उसकी सहन शक्ति से बाहर हो जाती है तो वह संबंध विच्छेद करने में भी पीडे नहीं हटता। 

दोनों के भावनात्मक ढांचे में भी भारी अंतर होता है। स्थिति यह है कि कोई किसी के विचारों को नहीं बदल पाता। अतः इस युगल के लिये एक दूसरे को सहन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। भावनाओं का यह अंतर उनके यौन संबंधों में भी प्रकट होता है। 

यदि पत्नी मेष है और पति कन्या है हो तो भी उन्हें प्रेम पूर्वक रहने में भारी कठिनाई का सामना करना पडेगा। दोनों एक दूसरे के सुझावों को काटते रहेंगे जिससे उनके बीच विद्रोह की भावना पैदा होगी। इस प्रवृति पर प्रारंभ में ही अंकुश लगाना चाहिये। आर्थिक मामलों में भी दोनों के खींचतान रहने की संभावना होती है। पति बहुत सावधानी से पैसा खर्च करता है जबकि पत्नी का हाथ काफी खुला रहता है। लेकिन पत्नी जब बीमार पडती है तो उसे कन्या पति से अधिक देखभाल करने वाला दूसरा नहीं मिल सकता। जहां तक यौन संबंधों की बात है तो पत्नी बहुत शीघ्र बेचैनी और उबाउपन अनुभवन करने लगती है। ये तैयार रहे। मेष पत्नी के लिये इसे करना कठिन होता है। 

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मेष - तुला:- 

यह मेल मेष अग्नि और तुला वायु तत्व का मेल है। किंतु कंुडली में ये राशियां एक दूसरे के आमने सामने होने के कारण उनके बीच में आकर्षण और विकर्षण दोनों हो सकते है। इनमें प्रबल शारीरिक या भावनात्मक आकर्षण रहता है। यदि उनमें टकराव होता है तो मेष की जीत होती है और तुला हार जाता है। जहां तक हो सके इस संबंध को टालना ही चाहिये। क्योंकि यह रिश्ता बहुत कमजोर नींव पर खडा होता है। 

यदि पति मेष हो और पत्नी तुला हो तो आरंभ में तो पत्नी उसके दबदबे से प्रसन्न होती है, किंतु उसकी प्रसन्नता अधिक समय तक नही रहती। तुला पत्नी संबंधों की समानता में विश्वास रखती है। शीघ्र ही उसे पता चल जाता है कि मेष पति घर का एकछत्र स्वामी बनना चाहता है। तब उसका सारा उत्साह भंग हो जाता है। तुला पत्नी में अपने को अभिव्यक्त करने की स्वाभाविक प्रतिभा होती है। जबकि मेष पति प्यार के दो शब्द बोलना कमजोरी की निशानी समझता है। पत्नी अपने पिछले संबंधों पर विचार करना चाहती है या भावी संबंधों की योजना बनाना चाहती है। पति इसमें सहयोग करने से मना कर देता है और पत्नी के मन में भविष्य के प्रति असुरक्षा की भावना पैदा हो जाती है। 
पत्नी दूसरों की, विशेषकर संकट में पडे लोगों की सहायता करना चाहती है। पति इसे समय की बर्बादी समझता है। उसे मैं से आगे कुछ नहीं दिखता। कभी कभी वह पत्नी की हीन भावनाओं का भी लाभ उठाने का प्रयास करता है। पत्नी के स्वतंत्र होने की इच्छा उसे चोट पहुंचाती है। यौन संबंधों में भी पत्नी की ओर से पे्रम की पहल का मेष पति गलत मतलब निकाल सकता है। इसे अपने पौरूष को चुनौती समझ सकता है। 

यदि पत्नी मेष हो और पति तुला हो तो पति के रंगीले स्वभाव के कारण काफी कठिनाई पैदा हो सकती है। मेष जातक में विपरीत लिंगियों के लिये भारी आकर्षण पाया जाता है। इसका लाभ उठाकर वह एक सप्ताह किसी लडकी के साथ खिलवाड भी कर सकता है। उसके पे्रम के वादों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिये। मेष पत्नी इसे सहन नहीं करती है और झगडा होता है। इसका परिणाम पति के उठकर चले जाने में होता है। कभी कभी पति कमजोर वर्गों की वकालत भी करने लगता है, जिसे पत्नी समय की बर्बादी समझती है। 

स्ंाबंधों में अधिक तनाव आ जाने पर तुला पति अपना रौद्र रूप भी दिखा सकता है। ऐसे समय में पत्नी को उसके साथ विवादों में नहीं पडना चाहिये। क्योंकि दोनों में से कोई भी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं होता। यौन संबंधों में तुला पति पत्नी से रोमांस की अपेक्षा रखता है। वह चाहता है कि पत्नी उत्तेजक वस्त्र धारण करे। घर के वातावरण को रोमांस पूर्ण बनाए और उसके साथ हर समय रोमांस के लिये तैयार रहे। मेष पत्नी के लिये इसे करना कठिन होता है। 

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मेष - वृश्चिकः- 

यह अग्नि और जल का संयोग है। जो कि भाप बनाता है। दोनों राशियों के स्वामी मंगल ही है। अतः दोनों एक दूसरों की शक्ति और क्षमता को सराह सकते है अथवा उनके बीच तीव्र स्पर्धा जन्म ले सकती है। सीधा सादा मेष जातक वृश्चिक जातक के प्रपंचों को समझ नहीं पाता। फिर भी, यदि दोनों के लक्ष्य समान हो तो यह एक उत्तम जोडी सिद्ध हो सकती है। लेकिन वे एक दूसरे से काफी अपेक्षाऐं रखते है। 

यदि पति मेष हो और पत्नी वृश्चिक हो तो दोनों जन्मजात युद्ध प्रिय होने के कारण एक दूसरे  से लडकर ही अपनी भडास निकाल लेते है। दोनों में से कोई अपनी गलती नहीं मानता है। कार्य के प्रति भावना में भी टकराव होगा। पत्नी चाहेगी कि पति एक ही स्थान पर काम करता हुआ उन्नति करता रहे। पति नया आकर्षक काम सामने आते ही पुराना छोडकर उसकी ओर निकल जाता है। पति को भविष्य की कोई चिंता नहीं है और पत्नी के सीख देने पर उसके दिमाग का पारा चढ जाता है। मेष जातक के लिये भावनाओं का कोई महत्व नहीं रहता। 

यौन संबंधों में पति पत्नी कभी तो घुल मिल जाते है और कभी उनके बीच टकराव होता है। पत्नी के रूठने पर पति के लिये मनाना असंभव हो जाता है। जिसके कारण पति का पारा चढने में भी देर नहीं लगती। यह संबंध बुद्धिमानी वाला नहीं है। पे्रमी तो क्या, ये दोनों दोस्त की तरह भी नहीं रह सकते। 

यदि पत्नी मेष है और पति वृश्चिक है तो पत्नी पति के हावी होने के प्रयासों का विरोध करेगी और जो वह चाहेगा उसका उल्टा करेगी। दोनों में मेल रहना बहुत मुश्किल है। पत्नी की ओर से निराश होकर पति अपना सारा ध्यान अपने व्यापार में लगा देगा। यौन संबंधों में भी पत्नी उससे दूर भागने का प्रयास ही करेगी। वृश्चिक जातको के लिये घरेलू वातावरण का बहुत महत्व होता है और अन्य सभी जातकों की अपेक्षा वे अपनी पत्नियों के प्रति सबसे वफादार रहते है। उनमें यौन की भूख भी अपार होती है। किंतु यह संयोग अपवाद होगा। 

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मेष - धनु:- 

अग्नि का अग्नि से कोई विरोध नहीं होता। लेकिन दोनों अपने अपने विचारों में स्वतंत्र होने के कारण उन्हें एक दूसरे की भावना व स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही होगा। धनु जातक उत्साही, मेष जातक के लिये प्रेरणा का काम करता है। जबकि मेष जातक धनु जातक के आशावादी दृष्टिकोण तथा ईमानदारी की सराहना करता है। दोनों के तीव्र गति में विश्वास करने के कारण शान्ति और शिथिलता की आशा करना व्यर्थ है। कोई दूसरे का रौब स्वीकार नहीं करेगा। सब मिलाकर यह एक सुखद साझेदारी हो सकती है। 

यदि पति मेष हो और पत्नी धनु जातिका हो तो पत्नी के लिये पति के व्यक्तित्व के आकर्षण से बच पाना कठिन होगा। पत्नी पति के हर नये विचार का उत्साह से स्वागत करेगी। भले ही उसका परिणाम कुछ न निकले। पति के ढलते हुये अहम को पत्नी के आशावाद से बहुत सहारा मिलता है। मेष जातक में स्वयं अपने वित्तीय भविष्य की योजना समझदारी से बनाने की बुद्धि नहीं होती। उस पर धनु पत्नी तो एकदम अव्यावहारिक होगी। अतः वित्तीय जिम्मेदारी पति को ही अपने कंधे पर उठानी पडेगी। अन्यथा वित्तीय कठिनाई से उनके मधुर संबंधों में कडवाहट आ सकती है। यदि वे अपने बाहर के व्यस्त कार्यक्रमों से समय निकाल सकें तो उनका वैवाहिक जीवन सुखमय रहेगा। सामान्यतया धनु स्त्रियों की गतिविधियां इतनी बहिर्मुख होती है कि वह अपनी भूख और कहीं शांत कर लेती है। जिसकी उन्हें कोई चिंता नहीं होती। 

यदि पत्नी मेष है और पति धनु है तो बहिर्मुखी जीवन से प्रेम और साथ साथ काम करने की भावना से वे एक दूसरे की ओर आकर्षित होंगे। फिर भी पत्नी को इसमें संदेह हो सकता है कि धनु पति इन संबंधों को अधिक समय तक निभा पायेगा। उधर धनु पति, मेष पत्नी को तब तक आदर्श समझता रहेगा जब तक वह व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उसके विचारों को मान्यता प्रदान करेगी। अपनी ईष्र्या पर नियंत्रण रख सकेगी और पति के निर्दोष हरजाईपन की उपेक्षा कर सकेगी। 

परिपक्वता आने पर पति घरेलू वातावरण के लाभ महसूस करने लगेगा, लेकिन उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। दांव लगाने की प्रवृति उसमें अन्त तक बनी रहती है। काम छोडते भी उसे देर नहीं लगेगी। संयोग से वह इतना भाग्यशाली होता है कि उसके अधिकांश दाव सही लगते है। लेकिन जब उसकी कोई योजना विफल होती है तो घर का सारा भार पत्नी पर आ पडता है। यह एक अस्थायी दौर होता है। क्योंकि पति शीघ्र ही पुरानी सारी क्षति की पूर्ति कर देता है। 

धनु जातक स्वभाव से वफादार नहीं होता। उसे अनेक प्रेम प्रसंगों में रस आता है। और इसके लिये उसके मन में स्वतः कोई अपराध बोध नहीं होता। पत्नी को भी निराश नहीं करता। क्योंकि ऐसा करने से उसके पौरूष के अभिमान को चोट पहुंचती है। उनके संबंध संतोषदायी और कभी कभी आश्चर्यजनक भी रहते है। 

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मेष - मकर:- 

अग्नि और पृथ्वी तत्व का यह योग तनावपूर्ण रहने की संभावना है। मेष का स्वामी मंगल अधीर और जोशीला ग्रह है। जबकि मकर का स्वामी शनि सावधान, शांत व मंद। मकर भविष्य की योजना बनाकर चलना चाहता है और इसके लिये प्रतीक्षा भी कर सकता है। मेष को तत्काल परिणाम चाहिये। प्रतीक्षा से उसे घृणा है। इस योग में लाभ कम और हानि ज्यादा है। 

यदि पति मेष है और पत्नी मकर है तो प्रारंभ में पति के पहली भेंट में ही बोले गये प्रेम के दो बोल पत्नी को अभिभूत कर देंगे। वह उसकी किसी पागलपन से भरी धनकमाउ योजना के प्रति भी आकर्षित होगी। किंतु पति को फिर शीघ्र उसकी सहज बुद्धि और निराशावाद का सामना करना होगा। मेष पति यह नहीं समझ पाता कि उसकी मकर पत्नी जगह जगह धन छिपाकर क्यों रखती है। वह उसे छेडता है। पत्नी पति को दुनिया का सबसे बडा अपव्ययी समझती है। दोनों की पटरी बैठना असंभव है और पति अन्यत्र सुख की खोज कर सकता है। 

सामाजिक दृष्टि से मकर पत्नी को इस संबंध से लाभ हो सकता है। मेष पति अपनी बहिर्मुखी प्रवृत्तियों में उसे भी शामिल करता है और मकर पत्नी की समझ में आने लगता है कि जीवन में काम के अतिरिक्त और भी कुछ है। लेकिन उसके अन्य पुरूषों के संसर्ग में आने से मेष पति के मन में ईष्र्या जन्म ले सकती है। उनके यौन जीवन में गंभीर समस्याएं नहीं आनी चाहिये। जो आती है, वे पत्नी के निराशावादी मूड के कारण आती है। 

यदि पत्नी मेष है और पति मकर है तो मेष स्त्री कभी कभी व्यावहारिकता के दौर पडने पर मकर जातक की ओर आकर्षित हो सकती है। मेष पति के महत्वकांक्षी विचार उसे अच्छे लग सकते है। उसके स्वतंत्रता प्रेम से भी उसकी पटरी बैठ जाती है। उधर मकर पति को मेष पत्नी की शक्ति और चरित्र की दृढता पा सकती है। लेकिन अधिक समय तक साथ साथ रहने पर पति के अपने काम में व्यस्त रहने पर पत्नी के मन में ईष्र्या भाव पैदा हो सकता है। बुनियादी तौर पर मकर पति बहुत सीधा सादा व्यक्ति होता है और मेष पत्नी उसके लिये बहुत भारी पड सकती है। दोनों के स्वभाव में भारी अंतर होता है। कभी कभी पत्नी पति को उसके निराशा के मूड से बाहर निकाल लेती है। लेकिन इससे उनके बीच तीव्र झडपें नहीं रूकती है। 

यौन संबंधों में मकर पति अधिक कामी नहीं होता। किंतु थोथे बहाने कर उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर देने पर वह शीघ्र बुरा मान जाता है। उसकी निराशा भी उसके यौन जीवन को प्रभावित करती है। इस दौर में पत्नी को साध्वी का जीवन बिताने के लिये तैयार रहना चाहिये। 

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मेष - कुंभ:- 

अग्नि और वायु का मेल बैठता है। इस योग में स्वामी ग्रह मेष का मंगल और कुंभ का स्वामी शनि अपार उर्जा पैदा करता है। यह उसके रचनात्मक उपयोग पर निर्भर करता है। कुंभ जातक मेष जातक को और मेष जातक कुंभ जातक को अपना मित्र समझेगा। मेष जातक और कुंभ जातक दोनों को नई और परंपरा से भिन्न बातें पसंद आती है। किंतु यदि किसी कुघडी में कुंभ जातक अप्रत्याशित बात कर दे तो इससे मेष जातक धैर्य खोकर चिढ सकता है। अतः यह योग हलचलपूर्ण किंतु अस्थिर रहता है। 

मेष जातक और कुंभ जातिका की पहली भेंट का परिणाम दोनों के बीच आकर्षण ही हो सकता है। घनिष्ठ संपर्क में आने पर मेष जातक को पता चलेगा कि कुंभ स्त्री की दिलचस्पी अन्य व्यक्तियों में भी है। वह इसे सहन नहीं कर पाता। परिणामस्वरूप दोनों में विवाद होता है। और अहम को चोट लगने से मेष जातक अपना सारा क्रोध कुंभ जातिका पर निकालता है। अधिकांश कुंभ जातिकाएं मित्रता के संबंध पसंद करती है। लेकिन मेष जातक के पास इसके लिये समय नही होता। उसके लिये स्त्री केवल स्त्री होती है। और मित्रता समलैंगिक से ही करता है। मेष व्यक्ति को कुंभ स्त्री के स्वतंत्र वृति अपनाने पर आपत्ति होती है। 

वैसे दोनों अधिक कामी नहीं होते। अन्य गतिविधियों में व्यस्त रहने के कारण भागते दौडते ही उनहें मिलने का समय मिल पाता है। वे इसकी अधिक चिंता भी नहीं करते। 

यदि पत्नी मेष हो और पति कुंभ हो तो पति पत्नी को मित्र और पे्रमिका के रूप में देखना चाहेगा। कुंभ जातक मन से सुधारवादी होते है। वे आफिस, मित्रों आदि सभी को बदलने का प्रयास करते है। भले ही वे सफल न हो। अतः पत्नी का सामना असामान्य और सनकी व्यक्तियों से हो सकता है। कुंभ जातक प्रायः हरफनमौला होते है। वे अधिक कामी नहीं होते है। इसके लिये उन्हें समय ही नहीं मिलता। इच्छा होने पर ही वे प्यार जताते है। और पत्नी उन्हें बहुत स्वार्थी पे्रमी समझती है। 

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मेष - मीनः- 

अग्नि और जल एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत है। दोनों के बीच समानता खोज पाना कठिन है। ओजपूर्ण मेष, मीन की रहस्यमय गहराई को मापने में असफल रहता है। उसके लिये मीन सौम्य या अनिश्चय वाली राशि है। यह संबंध लेन देन की भावना से ही सफल होता है। 

मेष जातक मीन जातिका के विचित्र और बदलते मूड को समझने में हमेशा असमर्थ होता है। किंतु इसे वह अधिक महत्वपूर्ण नहीं समझता। उसका संरक्षणात्मक रवैया मीन जातिका को परेशान कर सकता है। हो सकता है उस समय बीतने के साथ वे अपने को एक दूसरे के अनुकूल ढाल सकें। लेकिन उनके बीच पूर्ण समझ कभी स्थापित नही हो सकती है। मेष पति अनेक बार अपने कार्य में परिवर्तन कर सकता है और नये कार्य में पूरे उत्साह से लग सकता है। मीन पत्नी को इससे कितनी ही परेशानी हो, पति उससे समर्थन की आशा ही करेगा। जिससे तनाव पैदा होगा। पत्नी की वृत्ति पर पति का कोई ध्यान नहीं होता। 

दोनों के बीच यौन संबंधों में भी गलतफहमी हो सकती है। क्योंकि पत्नी रोमांटिक भ्रमों को बनाये रखना चाहती है। पति को पत्नी के साथ अधिक कोमलता बरतनी होगी। और अपनी स्वार्थी भावनाओं को नियंत्रण में रखना होगा। अन्यथा पत्नी की वैवाहिक संबंधों में रूचि समाप्त हो जायेगी। 

मेष जातिका और मीन जातक के संबंध जटिल हो सकते है। पति को निराशा या थकान में पत्नी की शक्ति और सहारे की आवश्यकता होती है। किन्तु ज्यों ही वह उसे दुलारने के लिये स्वयं को तैयार करती है, अचानक पति का पौरूष जाग जाता है और वह संरक्षक पति की भूमिका ग्रहण करने लगता है। कभी कभी मीन पति किसी समस्या को लेकर अपने खोल में घुस जाता है। और पत्नी उससे कट जाती है। वैसे वह अधिकांश निर्णय पत्नी पर छोड देता है। लेकिन यदि पत्नी के निर्ण उसकी योजनाओं से मेल न खाये तो वह उनकी उपेक्षा कर देता है।
 
यौन संबंधों में मीन पति स्थिति के अनुसार अपने को ढाल सकता है। किन्तु वह बहुत संवेदनशील होता है और कोई आलोचना सहन नहीं कर सकता। लडकों के साथ शराब पीने की उसकी प्रवृति से कभी कभी उसके यौन जीवन पर प्रभाव पडता है। पत्नी स्वयं को उपेक्षित महसूस करती है। वैसे उनके लिये ये आनंद के क्षण होते हैं।   

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Friday, 11 September 2020

Mesh rashi ka parichay / मेष राशि का परिचय

Posted by Dr.Nishant Pareek

Mesh rashi ka parichay 


मेष राशि का  परिचय 

मेष राशि के नामाक्षरः- चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, आ। 

राशिचक्र में मेष राशि पहली राशि है। इसे अंग्रेजी में एरिस कहते है। इसका प्रतीक मेढा या भेडा है। भेड जितनी सीधी और अनुशासन प्रिय होती है। भेडा अर्थात नर भेड उतनी ही आक्रामक और स्वच्छंदता पसंद करने वाला होता है। इस राशि का क्षेत्र राशिचक्र के आरंभ से लेकर तीस अंश तक होता है। मेष राशि का स्वामी मंगल है। इसके तीन द्रेष्काण  दस दस अंश के मंगल- मंगल, मंगल- सूर्य, तथा मंगल - गुरू है। 

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मेष राशि के अंतर्गत अश्विनी नक्षत्र के चारों चरण, भरणी नक्षत्र के चारों चरण तथा कृतिका नक्षत्र का पहला चरण आता है। इस तरह नौ नाम अक्षर इस राशि के अंतर्गत आते है। इसका प्रत्येक चरण तीन अंश और बीस कला मान का है। जो कि नवांश के एक पद के समान मान वाला है। इन चरणों के स्वामी इस प्रकार है- अश्विनी प्रथम चरण - केतु मंगल, अश्विनी द्वितीय चरण - केतु शुक्र, अश्विनी तृतीय चरण - केतु बुध, अश्विनी चतुर्थ चरण - केतु चंद्रमा। भरणी प्रथम चरण - शुक्र सूर्य, भरणी द्वितीय चरण - शुक्र बुध, भरणी तृतीय चरण - शुक्र शुक्र, भरणी चतुर्थ चरण - शुक्र मंगल, कृतिका प्रथम चरण - सूर्य गुरू। इन चरणों के नामाक्षर इस प्रकार है- चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, आ। 

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इस राशि का एक अन्य विभाजन त्रिशांश के अनुसार भी है। स्त्री जातक का गुण स्वभाव जानने के लिये त्रिशांश चक्र का विशेष महत्व है। इस चक्र में राशि के पहले अंश मेष के है। जिनका स्वामी मंगल है। पांच से दस अंश तक कुंभ राशि के है। जिनका स्वामी शनि है। दस से अठारह अंश तक धनु राशि के है। जिनका स्वामी गुरू है। अठारह से पच्चीस अंश तक मिथुन राशि के है। जिनके स्वामी बुध है। तथा पच्चीस से तीस अंश तक तुला राशि के है। जिनका स्वामी शुक्र है। गृहमैत्री चक्र के अनुसार मेष राशि सूर्य, चंद्र तथा गुरू के लिये मित्र राशि है। शुक्र तथा शनि सम राशि है तथा बुध के लिये शत्रु राशि है। 

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स्वभाव - प्रभाव:-

मेष राशि अग्नि तत्व वाली राशि है। अग्नि त्रिकोण मेष, सिंह तथा धनु में यह पहली राशि है। इसका स्वामी मंगल है। जो कि स्वयं अग्नि ग्रह है। राशि और स्वामी का यह संयोग इसकी अग्नि या उर्जा को कई गुना बढा देता है। लेकिन पानी के अभाव में आग केवल क्षार ही कर सकती है। उसे भाप में बदल कर रचनात्मक उर्जा का रूप नहीं दे सकती है। यही कारण है कि मेष प्रधान जातक अपनी शक्ति का लगभग दुरूपयोग ही करते है। 

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मेष राशि चर राशि है। इसलिये ये जातक ओजस्वी, दबंग, साहसी, तथा दृढ इच्छाशक्ति वाले होते है। परंतु कभी कभी चंचल प्रकृति व हठी स्वभाव वाले होते है। वे जन्मजात योद्धा होते है। बाधाओं को पार करते हुये अपना मार्ग बनाते है। किसी भी खतरे से डरते नहीं है। स्वच्छंद स्वभाव वाले, तथा अपने कार्य में किसी का भी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करते। यदि अपनी इच्छा से कार्य न करने दिया जाये तो काम छोडकर चले जाते है। इसी स्वभाव के कारण इनके जीवन में अनेक परिवर्तन आते है।

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यदि ये लोग अपने उग्र स्वभाव को नियंत्रण में रख सके तो वे भौतिक रूप से जीवन के हर क्षेत्र में सफल हो सकते है। सरकारी क्षेत्र में उच्च पदों पर जा सकते है। लेकिन इनको झूठी प्रशंसा करने वालों और चापलूसों करने वालों से सावधान रहना चाहिये। ऐसे लोग इनको झूठी प्रशंसा करके बेवकूफ बनाते है। और अपनी प्रशंसा सुनकर मेष राशि वाले अहंकारी हो जाते है। इनमें बहुत जल्दीबाजी होती है। नई योजनाओं को तसल्ली से करने की बजाय जल्दीबाजी में करने के कारण ये अपना काम खुद ही बिगाड लेते है। दूसरों की सलाह सुनना पसंद नहीं करते। दूसरों का कहना नहीं मानते। अपने हिसाब से काम करते है। किसी भी तरह की बात को सहन कर लेते है। अधिक महत्वकांक्षी होने के साथ साथ वे खुले दिल वाले तथा मुंहफट भी होते है। इनके मित्र कम और शत्रु ज्यादा होते है। अपने गुस्से के कारण ये मित्रों को भी शत्रु बना लेते है। इनको हीन भावना से बचना चाहिये। कई बार ये वहशी, नृशंस जैसे हो जाते है। हिंसक स्वभाव हो जाता है। कठोर अनुशासन प्रिय होते है। अस्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त करते है। अपने अधिनस्थों के लिये कठोर स्वभाव वाले होते है। प्राचीन परंपराओं और रीतिरिवाजों का विरोध करते है। बिना मतलब किसी के भी झगडे में पड जाते है। 

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ये लोग अपने कपडों का विशेष ध्यान रखते है। हमेशा साफ सुथरे नये कपडे पहनते है। सभी पर अपना रौब जमाना चाहते है। मेष राशि की लडकियां भी लडको की तरह ही महत्वकांक्षी और आदर्शवादी होती है। उनमें भी पुरूष जातको की तरह ही गर्मजोशी और उर्जा पायी जाती है। अपने दबंग स्वभाव और व्यक्तित्व के कारण वे सामाजिक जीवन में अग्रसर होती है। 

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कार्यक्षेत्र:- 

सुदृढ आत्मविश्वास वाले ये लोग बडे बडे व्यापारिक संगठनों को चलाने की क्षमता रखते है। यदि ये खुद पर नियंत्रण रखें तो जीवन की प्रत्येक सफलता को प्राप्त कर सकते है। इनका अनुमान हमेशा सही जाता है। ये चाहते है कि घर तथा व्यापार में इनकी बात ही सर्वोपरि हो। इनमें धन कमाने की बहुत लालसा होती है तथा क्षमता भी अच्छी होती है। जिन कामों में लम्बे चैडे खर्चों की बात होती है, वही काम इनको पसंद आते है। प्रबंध के मामले में एक तरफ जहां ये व्यवहारिक हो जाते है। वहीं दूसरी तरफ ये आवेश और अनुशासन भी अधिक पसंद करते है। इनके दिमाग में हमेशा बडी बडी योजनाएं चलती रहती है। बहुत बार आवेश में आकर ये निर्णय ले लेते है। जिनके कारण इनको कभी नुकसान भी होता है। 

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ये जातक सट्टेबाजी में भी रूचि रखते है। इसके बजाय यदि ये बु़िद्धमानी से सोचसमझ कर काम करे तो इन्हें बहुत फायदा हो सकता है। इनको कोर्ट केस आदि झंझटों से बचना चाहिये। ऐसे मामलों में पडने पर ये ज्यादा उलझ जाते है। जिन कामों में इनका नाम होता है, वे काम करना ये ज्यादा पसंद करते है।

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ये लोग राजनीतिक नेता, संगठन के नेता, उपदेशक, वक्ता, कम्पनी प्रमोटर, सैनिक या पुलिस अधिकारी, रसायन शास्त्री, शल्य चिकित्सक, लोहा व इस्पात कर्मी, यंत्री आदि के रूप में विशेष सफलता प्राप्त करते है। गलत संगत में फंसने पर ये अपराध भी कर सकते है। इसके अलावा कसाई, नाई, अमीन, लुहार, दर्जी, नानबाई, हथियार बनाना, घडी बनाने वाले, रंगसाज, रसोइये, बढई, मुक्केबाज, विधि सलाहकार, अग्निशमन अधिकारी, संतरी, जासूस, पहलवान, भटटी कर्मी, खेल सामग्री विके्रता आदि। 

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विवाह, प्रेम तथा दोस्ती:-

मेष जातकों के भावनात्मक जीवन में प्रेम और मित्रता का प्रमुख स्थान होता है। अपने प्रेम प्रदर्शन में वे अत्यन्त उन्मुक्त और साहसी होते है। अपने मधुर स्वभाव से विपरीत लिंग को अपनी तरफ आकर्षित करते है। इनमें भी वे स्वच्छंदता, साहस, अधैर्य, तथा भावावेश पर नियंत्रण कर सके तो उनका वैवाहिक जीवन बहुत अच्छा व सुखमय रह सकता है। लेकिन वे ऐसा नहीं करते है। आवेश में आकर अपने ही जाल में फंस जाते है। इनके लिये सबसे अच्छी बात यह होगी कि वह अपने जीवन को व्यवस्थित करे। विवाह के बंधन में बंध जाये। परंतु इनके गुस्से के कारण ये लोग अपना जीवन स्वयं बिगाड लेते है। अपने आदर्श जीवनसाथी की खोज में ये अनेक प्रेम प्रसंग बनाते है। इन जातकों के लिये निष्ठा का अधिक महत्व नहीं होता। इनकी मैं के कारण ही इनके संबंध टूटते रहते है। इसके परिणामस्वरूप इनको प्रेम संबंधों में बहुत पीडा होती है। ये लोग स्त्रियों के मन को पढ नही पाते है। उनके साथ संबंधों में गलतियां कर देते है। परंतु यदि ये लोग लेन देन की भावना से काम करेंगे तो सुखी रहेंगे। 

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इनका व्यक्तित्व आकर्षक होता है। परंतु ये किसी की बात सुनने को तैयार नहीं होते। यदि ये अपने स्वार्थ और कामवासना को नियंत्रित कर सके तो इनकी बहुत सी समस्यायें सुलझ सकती है। फिर मेष राशि वाले जातक एक अच्छे साथी, मित्र व प्रेमी सिद्ध हो सकते है। विपरीत लिंग के प्रति इनमें कोई भी गंदे विचार नहीं होते। वे उनके प्रति सराहना की भावना रखते है। वे खुद महिलाओं की रक्षा करने की भावना रखते है।
 

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मेष राशि की स्त्रियां भी बहुत आदर्शवादी होती है। प्रेम और वैवाहिक संबंधों के टूटने का डर इनको भी रहता है। वे रक्षक पुरूषों की तरफ जल्दी आकर्षित होती है। उनके समक्ष समर्पण के लिये तैयार रहती है। ये पे्रम प्रसंगों में बढ चढ कर सहयोग करती है। इसमें उनकी इच्छा प्रबल होती है। यदि इनको कोई दुर्बल पुरूष मिल जाता है तो उसे ये तुरंत ही छोड देती है। यदि उनका पति दुर्बल हो तो ये तुरंत उस पर हावि हो जाती है। इस राशि की स्त्रियां हाजिर जवाब और स्वच्छंद स्वभाव वाली होती है। वे अपने रूप रंग पर घमंड करने वाली तथा शान शौकत दिखाने वाली होती है। अपने परिवार के बारे में बढ चढ कर बोलती है। जलन और घमंड ही इनकी सबसे बडी कमजोरी होती है। ये हमेशा यह चाहती है कि उनका पति हमेशा उनके पीछे भागे। उनकी तारीफ करे। उनके मुंह पर किसी और स्त्री की तारीफ न करे। यदि कोई सीधा साधा आदमी इनका पति बन जाये तो उसकी जिंदगी नरक बन जाती है। यदि ये रोमांस के रंग में आ जाये तो फिर सारी शर्म त्याग कर संभोग का पूरा आनंद लेती है। 

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सिंह या धनु राशि के व्यक्ति मेष जातिका के लिये अच्छे पति सिद्ध हो सकते है। तुला वाले भी हर स्थिति में उनसे शांति बनाकर के उनके गुस्से को कम कर सकते है। लेकिन इनमें सबसे पहले अच्छे और सकारात्मक पति के रूप में मेष वाले जातक ही होंगे। उनको सुंदर, चतुर व अच्छी पत्नियां ही चाहिये। अपने रंग में आने पर वे भी अपनी क्षमता से अधिक खर्च करते है। अतः मेष वाले जातकों की पत्नियों को अपने पति से मिले धन का एक भाग बचा कर रखना चाहिये।

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मेष राशि वाले व्यक्ति अपने परिवार से बहुत पे्रम करते है। वे अपना ज्यादातर समय परिवार के साथ बिताने का प्रयास करते है। अपने घर को साफ सुथरा रखने का प्रयास करते है। अच्छे से अतिथि सत्कार करते है। दोस्तों की कोई कमी नहीं होती। 

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स्वास्थ्यः- 

मेष राशि के जातक बहुत ही चंचल, आवेश में रहने वाले, तथा लंबे लंबे कदम चलने वाले होते है। उनका सिर बडा होता है। घने रूखे बाल होते है। नाक सीधी व होंठ आगे से निकले हुये होते है। लंबा चेहरा होता है। स्वास्थ्य के मामले में ये सुखी होते है। परंतु अधिक परिश्रम करने के कारण खुद की तबीयत खुद ही खराब कर लेते है। इसलिये उनको संयम से काम करना चाहिये। दूसरों पर भरोसा नहीं करते। इनमें रोगों से लडने की पूर्ण क्षमता होती है। लेकिन इनको छोटी छोटी चोटों व गंभीर दुर्घटनाओं से सावधान रहना चाहिये।

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सबसे अधिक खतरा इनको अपने सिर और चेहरे से है। जो कि मेष राशि के प्रभाव में है। मेष से छठा रोग भाव कन्या राशि का स्थान है जो कि पाचन क्रिया से जुडा है। अतः मेष राशि के जातक सिरदर्द, जलन, तीव्र रोग, मस्तिष्क रोग, पक्षाघात, मिर्गी, मुंहासें, अनिद्रा, दाद, आधाशीशी, चेचक, मलेरिया, आदि रोगों से पीडित हो सकते है। उन्हें आराम का विशेष ध्यान रखना चाहिये। शाक सब्जियों का सेवन करना चाहिये। मांस मदिरा आदि नशे से दूर रहना चाहिये। 

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मेष राशि का बच्चा बचपन से ही झगडालू मारपीट, गाली गलौच वाला होता है। वह निरंकुश, मौलिक खेलप्रिय, तथा सभी कार्यों में आगे बढकर हिस्सा लेता है। जिससे उसे जल्दी ही लोकप्रियता मिल जाती है। इसके सिर में चोट लगती रहेगी। इस विषय में अवश्य ध्यान रखें कि ज्यादा चोट न लग जाये।

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द्रेष्काण, नक्षत्र व त्रिशांशः-
 
लग्न या चंद्र, इनमें से जो भी बली हो, वह किस द्रेष्काण में है, किस नक्षत्र पद या त्रिशांश में है, इसका भी जातक के चरित्र तथा स्वभाव पर भारी पडता है। हमारे विचार से इस संबंध में लग्न मेष के लिये यह देखना उचित रहेगा कि लग्न किस द्रेष्काण में है। इसी प्रकार चंद्र मेषों के लिये उनका नक्षत्र पद देखना उचित होगा। नाम मेषों का भी उनके नाम के पहले अक्षर के अनुसार केवल नक्षत्र पद देखना संभव होगा। सूर्य मेष के अनुसार गोचर का फलादेश करने की प्रणाली अधिकांशतः पश्चिमी देशों में है। इसमें सायन सूर्य की स्थिति देखी जाती है। 

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मेष के पहले द्रेष्काण पर दुहरे मंगल का प्रभाव है। अतः राशि के पहले दस अंशों में लग्न की स्थिति होने पर जातक के स्वभाव में आवेश की मात्रा ज्यादा होती है। उसमें बिना सोचे समझे किसी भी दिशा में छलांग लगाने की प्रवृति पाई जाती है। मध्य द्रेष्काण में राशि के दसवें अंश से बीसवें अंश तक, लग्न की स्थिति होने पर यद्यपि जातक के स्वभाव में मंगल और सूर्य के योग से उर्जा की कोई कमी नहीं होगी, तथापि निरंकुशता का स्थान उदारता और शालीनता ले लेगी। इससे उसमें अभिमान और चापलूसीप्रियता जैसे गुण भी आ सकते है। तीसरे द्रेष्काण में अर्थात राशि के अन्तिम दस अंशों में लग्न की स्थिति होने पर गुरू मंगल की उग्र प्रवृतियों को बहुत सीमा तक शांत करेगा। जातक अधिक संतुलित व्यवहार का परिचय देगा, लेकिन उसकी अधिकांश प्रवृतियां एक ही दिशा में प्रवृत करेगा। 
नक्षत्र पदों में अश्विनी के पहले चरण का स्वामी केतु मंगल जातक को क्रोधी और निरंकुश बनायेगा। दूसरे चरण का स्वामी केतु शुक्र उसे विलासी बनाता है। तीसरे चरण का स्वामी केतु बुध उसके विचारों में अस्थिरता लायेगा। जबकि चैथे चरण के स्वामी केतु चंद्रमा उसमें भाप जैसी उर्जा पैदा करेगा। भरणी के पहले चरण का स्वामी शुक्र सूर्य व्यक्ति को अभिमानी व खुशामदप्रिय बनायेगा। दूसरे चरण का स्वामी शुक्र बुध बौद्धिक कार्यों में प्रवृत करेगा। तीसरे चरण का स्वामी शुक्र शुक्र जातक को संतुलित या दुहरे व्यवहार की प्रवृति देगा। चैथे चरण का स्वामी शुक्र मंगल उसमें उग्रता के साथ मन के भावों को प्रकट न होने देने का गुण प्रदान करेगा। कृतिका के पहले चरण का स्वामी सूर्य गुरू उसमें उदारता और शालीनता लायेगा। 

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कुछ विशेषः- 

भारतीय आचार्यों ने मेष राशि का रक्त वर्ण कहा है। ये लोग अपने व्यवहार में इसी रंग को पसंद करते है। इस राशि का रत्न मूंगा है।  यह पूर्व दिशा की संकेतक है। इसका स्वामी मंगल है। मंगल का मूलांक 9 है। कीरो के अनुसार यह अंक भारी उथल पुथल का अंक है। मेष जातकों के जीवन में यह अंक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वारों में मंगलवार है। मंगलवार के अधिष्ठाता भगवान कार्तिकेय है। जिनका वाहन मोर है। 

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मेष राशि निम्न वस्तुओं, स्थानों तथा व्यक्तियों की संकेतक है- 

बम, विस्फोटक पदार्थ, भारी अम्ल, रेल, टैक्टर, बसें, मोटर, मशीनें, लोहा, इस्पात, चारागाह, रेतीली भूमि, पहाडी निर्जन स्थान, चोरों के अडडे, टेकरियां, पशुओं के बाडे, नई जोती हुई भूमि, सैनिक व पुलिस अधिकारी, रक्षा विभाग के कर्मचारी, शल्य चिकित्सक, कसाई, नाई, लुहार, दर्जी, नानबाई, घडी निर्माता, रसायन शास्त्री, अमीन, चोर, रंगसाज, बढई, मुक्केबाज, लोहा, इस्पात कर्मचारी, दमकल कर्मी, भटटा मिल मजदूर आदि। 

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Navagraho ke saral upay / नौ ग्रहों के सरल उपाय

Posted by Dr.Nishant Pareek

Navagraho ke saral upay 

नौ ग्रहों के सरल उपाय

ज्योतिष के अनुसार आकाश में भ्रमण करने वाले नौ ग्रहों का पृथ्वी पर स्थित सभी प्राणियों, पेड - पौधों तथा जीव जंतुओं पर समान रूप से प्रभाव पडता है। इन ग्रहों के शुभ फल प्राप्त करने के लिये तथा अशुभ फलों के निवारण के लिये ज्योतिष के प्राचीन आचार्यों ने अनेक शास्त्रोक्त उपाय बताये है।  जिनका विधि विधान व पूरी भावना से पालन करने पर निश्चित रूप से लाभ होता है। ग्रहों की अशुभता निवारण हेतु प्रस्तुत है सरल उपायः- 

सूर्य को बली करने के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


चंद्रमा को बली करने के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


मंगल शांति के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


बुध को बली करने के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


गुरू को बली करने के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


शुक्र को बली करने के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


शनि को बली करने के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


राहु शांति के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


केतु शांति के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


कालसर्प दोष शांति के आसान उपाय जानने के लिये क्लिक करे।


मांगलिक दोष का संपूर्ण विवेचन जानने के लिये क्लिक करे।


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