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Tuesday, 21 September 2021

kalsarp yog se kaisi pareshani aati hai ?/ कालसर्प योग से कैसी परेशानी आती है ? जानिए इस लेख में

Posted by Dr.Nishant Pareek

kalsarp yog se kaisi pareshani aati hai ?



कालसर्प योग से कैसी परेशानी आती है ? जानिए इस लेख में 

कालसर्प योग जीवन में अनेक प्रकार की बाधा और दुर्भाग्य उत्पन्न करता है। यह मानना अनुचित नहीं है। यदि किसी भी व्यक्ति की कुंडली में कालसर्प योग बन रहा हो रही हो तथा अन्य ग्रह योगों के कारण कालसर्प योग प्रभावहीन न हो रहा हो, तो व्यक्ति को अनेक प्रकार के अवरोध, विसंगतियों और दुर्भाग्य से जीवनपर्यन्त संघर्ष करना पड़ता है। उसके जीवन में पग पग पर बाधा आती रहती है। किस प्रकार की बाधा व अवरोध उस व्यक्ति के जीवन को बाधित करेगी, यह तथ्य ग्रहों की जन्मांग में संस्थिति पर निर्भर करता है।

सूक्ष्मता से देखें तो संतानहीनता, पारिवारिक विसंगतियाँ, कलहपूर्ण दाम्पत्य जीवन, आर्थिक विषमता अथवा विपन्नता, धन हानि, स्वास्थ्य, निरन्तर अथवा असाध्य व्याधि से पीड़ा, व्यवसाय तथा व्यापार में अवनति, हानि अथवा प्रगति का अवरुद्ध हो जाना भी कालसर्प योग का प्रतिफल है। कुटुंब में सम्पत्ति सम्बन्धी कलह, विवाह में विलम्ब अथवा विवाह में अवरोध, सन्ततिहीनता, धनहीनता तथा व्यवसायहीनता आदि से सम्बन्धित दुर्भाग्य कालसर्प योग के परिणाम के अन्तर्गत आता है। इस विषय में एक महत्त्वपूर्ण परामर्श यह है कि कालसर्प योग की शान्ति के अतिरिक्त जन्मांग में विद्यमान धनहीनता, सन्तानहीनता अथवा अन्य प्रकार की बाधाओं के शमन हेतु समुचित तथा अनुकूल मंत्र चयन करने के पश्चात् सम्बन्धित अनुष्ठान किसी योग्य, अनुभवी और विद्वान् आचार्य द्वारा सम्पन्न कराना चाहिए अथवा संपुटित मंत्रों का जप स्वयं विधिविधान सहित करना चाहिए। इसी कारण इस कालसर्प योग सीरीज के अन्त में कालसर्प योग शमन विधान के पश्चात् मैं विभिन्न विसंगतियों, अवरोधों, विषमताओं, वैवाहिक विलम्ब, धनहीनता आदि की अशुभता को निर्मूल करने हेतु अनेक मंत्र तथा सम्बन्धित प्रयोग आदि का उल्लेख अवश्य करूंगा। इसलिये आप निरंतर जुडे रहिये। 

यह भी देखने में आता है कि शनिकृत पीड़ा अथवा व्याधि अथवा अथवा मंगली दोष के कारण उत्पन्न होने वाली विघटनकारी स्थितियाँ, जैसे- वैधव्य कारक व्याधियों का भी कारण कालसर्प योग को ही मान लिया जाता है। यह उचित जन्मांग के भलीभाँति अध्ययन करने के पश्चात् यह सुनिश्चित करना चाहिए कि समस्या का कारण क्या है तथा उसका समाधान कैसे होगा। यदि शनिकृत वेदना जीवन में बाधा कर रही है तथा उसकी प्रगति, प्रतिष्ठा और प्रफुल्लता, अवरुद्ध हो गयी है तो कालसर्प योग की शान्ति के पश्चात् भी व्यक्ति की परेशानी में न्यूनता नहीं आयेगी। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए जीवन में उत्पन्न होने वाले अवरोधों के शमन और निवृत्ति हेतु सम्बन्धित विषयों तथा उनके समाधान का उल्लेख भी इसी क्रम में आने वाले लेखों में किया जायेगा।

कालसर्प योग के कारण उत्पन्न होने वाली विसंगतियाँ तथा दुर्भाग्य की परिकल्पना परिसीमित है तथा उसकी अवधि और परिधि का सम्यक् ज्ञान नितान्त अनिवार्य है जिसका शास्त्रसंगत उल्लेख अगले लेख कालसर्प योग और संतानहीनता, में किया जायेगा। 


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Sunday, 11 July 2021

Kalsarp yog or rahu ketu / कालसर्प योग और राहु केतु

Posted by Dr.Nishant Pareek

Kalsarp yog or rahu ketu

 कालसर्प योग और राहु केतुः-

 काल और सर्प शब्द के मिलने से जो योग ज्योतिष शास्त्र में बनता है, वह कालसर्पयोग कहलाता है। जो कि किसी की भी कुंडली में सर्वाधिक चर्चित बिन्दुओं में एक है। स्वाभाविक है कि ज्योतिषशास्त्र के आरंभ से आजतक कालसर्पयोग विभिन्न रूपों से व्यक्ति को उद्विग्न करता आ रहा है। इस परिदृश्य में सत्य और असत्य, पाखण्ड आदि भी सम्मिलित है। 

राहु केतु को छायाग्रह माना गया है। जो कि कालसर्पयोग के दो ध्रुव हैं। इसलिये सबसे पहले  इनका प्रारंभिक ज्ञान आवश्यक है। जब समस्त ग्रह राहु और केतु की धुरी के एक ओर हों तथा शेष भाग ग्रह से रिक्त हो तो कालसर्पयोग का निर्माण होता है। राहु और केतु हमेशा एक दूसरे से सात राशि की दूरी पर रहते है।  इनमें 180 अंश का अन्तर होता है। राशि चक्र 360 अंश का होता है। यदि सभी ग्रह 180 अंश के क्षेत्र, अर्थात् राहु एवं केतु की धुरी के एक तरफ हों, तो दूसरा 180 अंश का क्षेत्र खाली होगा। कुंडली में इस ग्रह स्थिति को ही कालसर्पयोग कहते है। इस ग्रहयोग के निर्माता राहु एवं केतु का संक्षिप्त परिचय भी देना आवश्यक है-

 राहु-केतु का परिचयः-

          यह मान्यता है कि राहु-केतु ग्रह नहीं, छायाग्रह हैं। किसी भी दूरदर्शी यन्त्र से इन्हें देखना असम्भव है। जनमानस के मस्तिष्क में इनके विषय में अनेक प्रश्न हैं। इन छायाग्रहों के मूल ग्रह कौन हैं? ग्रहछाया का अस्तित्व किस रूप में है, जिसे राहु अथवा केतु कहा गया है ? इनके उत्तर भी बहुत ही चिन्तनीय है। सूर्य के मार्ग को जिन दो बिन्दुओं पर चंद्र का मार्ग काटता है उसका उपरिवर्ती बिन्दु राहु तथा निम्नवर्ती बिन्दु केतु कहा जाता है। पृथ्वी 365 दिनों में सूर्य की एक परिक्रमा पूर्ण करती है, चंद्रमा 24 घंटे में पृथ्वी की एक परिक्रमा करता है। आभास यह होता है कि सूर्य एवं चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे हैं। जैसे रेलगाड़ी स्टेशन की दिशा में गतिशील हो अथवा स्टेशन रेलगाड़ी के समीप आने लगे, प्रतीत एक जैसा होगा। 

इसी प्रकार पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा अथवा पृथ्वी की सूर्य द्वारा परिक्रमा एक जैसी आभासित होगी। सूर्य एवं चन्द्रमा की कक्षा परस्पर जिस स्थल पर कटती है। अथवा इन प्रकाश पुंज ग्रहों की कक्षाओं का प्रभाव क्षेत्र राहु एवं केतु नाम से विख्यात है।

राहु-केतु छायाग्रहों की मानव जीवन में अत्यन्त प्रभावकारी भूमिका है। जीवन के 25 वर्ष इन छायाग्रहों के आधिपत्य में रहते हैं। 18 वर्ष राहु की महादशा तथा 7 वर्ष केतु की महादशा में व्यतीत होते हैं। साथ ही अन्य सूर्यादि ग्रहों की दशा के मध्य अंतर्दशा व प्रत्यंतर दशा में भी राहु-केतु की दशा आती ही है। यह समय वर्ष 9 माह 15 दिन का है। व्यक्ति के जीवन में कुल 44 वर्ष 9 माह 15 दिन की अवधि राहु केतु के प्रभाव में होती है। इसलिये इन छायाग्रहों की वास्तविक क्षमता और शक्ति की असीमित है। अनेक प्रकार की शुभ अशुभ स्थितियाँ इनकी शक्ति से बनती बिगडती है। इनके द्वारा निर्मित अतिविशिष्ट ग्रह व्यवस्था को कालसर्पयोग संज्ञा देना उचित ही है।


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