Sunday, 17 May 2026

कालसर्प योग जैसी ही पीडा देती है कुंडली में ये ग्रह युतियां-

Posted by Dr.Nishant Pareek

 कालसर्प योग जैसी ही पीडा देती है कुंडली में ये ग्रह युतियां-


स्पष्ट है कि कालसर्प योग का विचार सदा लग्न से करना चाहिए। लग्न कुंडली में राहु और केतु किन भावों को प्रभावित कर रहे हैं इसी पर विशेष ध्यान देना चाहिए तथा उसी के आधार पर कालसर्प योग द्वारा प्रदत्त अशुभ प्रभाव का निर्णय करना चाहिए। चन्द्र लग्न अथवा नवमांश लग्न तथा अन्य लग्न आदि से कालसर्प योग का विचार करने की गलती नहीं करनी चाहिए। कालसर्प योग के जिस अशुभ प्रभाव का विवेचन हमने यहाँ किया है वह तो मूलतः सातों ग्रहों के राहु और केतु की धुरी के एक तरफ स्थित होने से होता है । 

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परन्तु अनेक ऐसी ग्रह स्थिति हैं जिन्हें सामान्यतः कालसर्प योग की संज्ञा नहीं दी जाती है परन्तु वह भी काल सर्प योग की तरह ही एक अभिशाप है तथा जीवन के अनेक क्षेत्रों को आतंकित तथा भयभीत करती है। यह ग्रह स्थितियाँ निम्नांकित हैंः

(1) यदि शनि, राहु से आठवें भाव में हो, तो भी कालसर्प योग के समान ही अशुभ फल प्रदान करता है। 

(2) यदि चन्द्रमा से राहु आठवें  भाव में हो, तो भी कालसर्प योग के समान ही अशुभ फल समझना चाहिए।

(3) यदि राहु ४, ८ या १२ वें भाव में हो तथा राहु और केतु दोनों के ही साथ क्रमशः मंगल व शनि अथवा सूर्य व चन्द्रमा अथवा चन्द्रमा व बुध अथवा शनि और सूर्य संयुक्त हों, तो भी कालसर्प योग के समान ही अशुभ फल प्राप्त होता है। 

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(४)  इन ग्रहों की युति अथवा परस्पर दृष्टि सम्बन्ध भी कुंडली में अशुभता का प्रतीक है तथा जब इन ग्रहों के साथ राहु और केतु का सम्बन्ध उनकी धुरी पर स्थित होने के कारण निर्मित हो रहा हो, तो अशुभता में अतिवृद्धि होती है। ग्रहों के शुभ फल न्यून हो जाते हैं तथा अशुभ फल जीवन को पीडित करते हैं। 

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 नक्षत्रों को २७ भागों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक नक्षत्र में 4 चरण होते हैं तथा 9 चरणों की अथवा ३० अंशों की एक राशि होती है। २-२ नक्षत्रों को एक-एक योनि से नामांकित किया गया है। योनि का अर्थ मानव शरीर के यौन अंगों से ही सम्बद्ध है। 

                यदि पति और पत्नी की योनि में समानता तथा सम्यक् मिलान अनुकूलता प्रदर्शित करता है तो पति और पत्नी दोनों को ही यौन सुखों में प्रचुर आनन्द प्राप्त होता है तथा यौन सम्बन्धों के विषय में उनके विचारों में एकरूपता रहती है। 

                मृगशिरा तथा रोहिणी नक्षत्र में जन्म होने से सर्प योनि होती है। यदि सर्प योनि में जन्म हो, तो व्यक्ति को अपने जीवन में अत्यन्त संघर्षो का सामना करना पड़ता है। सुखों का अभाव होता है तथा समस्याओं के अनेक आयाम निरन्तर निर्मित होते रहते हैं। सर्प योनि में जन्म होने से भी कालसर्प योग के समान ही अशुभ फल प्राप्त होता है। सर्प योनि की शत्रुता नकुल योनि से है। 

                   उत्तराषाढ़ तथा अभिजित् नक्षत्र की नकुल योनि होती है। कदाचित् इन नक्षत्रों में वर और कन्या का जन्म होने पर परस्पर विवाह नहीं करना चाहिए। अर्थात् रोहिणी तथा मृगशिरा नक्षत्र में जन्म हो, तो उत्तराषाढ़ नक्षत्र में जन्म लेने वाला जीवन साथी कदाचित् जीवन में सुखों का अभाव उत्पन्न करेगा। उल्लेखनीय है कि भगवान कृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। उन्हें जीवन में असंख्य कठिनाईयों तथा समस्याओं का सामना करना पड़ा। उनके जन्मांग में अनेक प्रभावशाली राजयोग, शुभ योग, उच्च व स्वग्रह आदि योग विद्यमान हैं फिर भी उन्हें कालिया नाग का भेदन करना पड़ा। बाल्यकाल से लेकर जीवन भर युद्ध और संघर्ष करना पड़ा। इसी प्रकार से जिस व्यक्ति का जन्म सर्प योनि में होता है उसे भी कालसर्प योग के समान ही अशुभ फल प्राप्त होता है। 

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(5) राहु और केतु सदा वक्री गति से भ्रमण करते हैं इसलिए यदि राहु और केतु के साथ वक्री क्रूर ग्रह स्थित हों, तो कालसर्प योग के प्रभाव में प्रचुर वृद्धि होती है। यदि राहु और केतु जिन राशियों में स्थित हों, उनके स्वामी पाप ग्रह हों तथा वक्री गति से भ्रमण कर रहे हों और 6, 8 या 12 भाव में स्थित हों, तो भी कालसर्प योग के समान ही अशुभ फल प्राप्त होता है। जबकि जन्म कुण्डली में कालसर्प योग का निर्माण न हो रहा हो। यदि यही ग्रह स्थिति उस समय उत्पन्न हो, जब सभी ग्रह राहु और केतु के मध्य स्थित हों, तो कालसर्प योग जीवन को सर्वाधिक भयभीत और आतंकित करता है। 

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(6) उल्लेखनीय है कि कालसर्प योग पर विचार करते समय 7 ग्रह सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि पर ही विचार किया जाना चाहिए। इन्हीं 7 ग्रहों को राहु और केतु की धुरी के मध्य स्थित होना चाहिए। यदि यह सभी ग्रह राहु और केतु की धुरी के एक ओर स्थित हों तथा दूसरी ओर कोई भी ग्रह नहीं है तो कालसर्प योग का निर्माण होता है। विज्ञान ने 3 नये ग्रहों को खोजा है। सम्भव है भविष्य में कुछ और ग्रह, जो अभी वैज्ञानिकों की पकड से बाहर हैं, उनकी भी खोज हो। कालसर्प योग का विचार करते समय यूरेनस, नेप्च्यून, प्लूटो पर विचार नहीं करना चाहिए। यदि मूल 7 ग्रह राहु और केतु की धुरी के एक ओर हों तथा दूसरी ओर यूरेनस, नेप्च्यून और प्लूटो में से कोई एक या तीनों ग्रह हों, तो भी कालसर्प योग खण्डित नहीं माना जायेगा। 

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(7) यदि किसी जन्मांग में कालसर्प योग निर्मित हो रहा हो तथा राहु अथवा केतु या दोनों के साथ कुछ अन्य ग्रह संयुक्त हों, तो यह देखना चाहिए कि राहु के अंशों से उन ग्रहों के अंश आदि कम हैं अथवा अधिक। तथा इसी प्रकार से केतु के अंशों से संयुक्त ग्रहों के अंश अधिक हैं या कम। यदि सभी ग्रह राहु और केतु के मध्य स्थित हों तथा राहु से संयुक्त ग्रह या ग्रहों के अंश राहु से कम हैं तो वह ग्रह राहु और केतु की धुरी के बाहर होगा। इसी तरह से यदि केतु के अंश से संयुक्त ग्रह के अंश अधिक हैं तो वह ग्रह भी राहु और केतु की धुरी के बाहर होगा। उस स्थिति में कालसर्प योग स्वतः ही खण्डित हो जायेगा। 

(8) यदि समस्त ग्रह राहु और शनि के मध्य स्थित हों, तो उसे सर्प योग कहते हैं। इसे यद्यपि आंशिक कालसर्प योग नहीं कहा जा सकता, तथापि इसका प्रभाव भी सम्बन्धित भावों के फल में बाधा उत्पन्न करने के समान ही होता है। 

(9) यदि चन्द्रमा शनि से संयुक्त हो तो उसे विष योग कहते हैं। यह भी एक अशुभ योग है जिसके कारण व्यक्ति जीवन भर मानसिक रूप से व्यथित, चिंतित तथा दुःखी रहता है। इसी तरह से राहु के साथ यदि बृहस्पति की युति हो, तो उसे “गुरु-चण्डाल‘ योग के नाम से जाना जाता है। यह भी अशुभ योग है जो बृहस्पति से सम्बन्धित शुभ फलों को आतंकित और आक्रान्त करता है। 

(10) इन सभी अशुभ ग्रह स्थितियों तथा ग्रह योगों का फल जीवन में संबंधित ग्रहों की दशाओं-अंतर्दशाओं में प्राप्त होता है परन्तु कालसर्प योग का अशुभ फल जीवन भर प्राप्त होता रहता है तथा राहु और केतु की दशाओं-अंतर्दशाओं में विशेष रूप से प्राप्त होता है। 

मन्दिर में भोग, अस्पताल में रोग तथा ज्योतिष में योग का महत्त्व सर्वविदित है। योग एक से अधिक ग्रहों के परस्पर सम्बन्ध से निर्मित होता है या किसी ग्रह की किसी राशि या भाव विशेष में स्थिति से योग का निर्माण होता है परन्तु अधिकांश योग एक से अधिक ग्रहों के परस्पर विशेष सम्बन्ध संरचना करने पर ही निर्मित होते हैं। जिन योगों का ऊपर विवेचन किया गया है वह योग कुछ विशेष ग्रह स्थिति के कारण ही निर्मित हो रहे हैं। ग्रह योग या तो शुभ होते हैं या अशुभ होते हैं। शुभ योगों का ज्योतिष विज्ञान में बाहुल्य है परन्तु कुछ अशुभ योग भी हैं। ज्योतिष विज्ञान में जिनका भले ही कम उल्लेख हो, परन्तु उनमें से किसी एक का भी जन्मांग में संस्थित होना जीवन की सुख सम्पन्नता को समस्याओं तथा संघर्ष से आक्रान्त करता है। यदि किसी जन्मांग में कालसर्प योग के साथ-साथ केमद्रुम योग तथा शकट योग की भी संरचना हो, तो करेला तथा नीम चढ़ा, वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है। फिर दुःखों तथा समस्याओं का कोई अन्त नहीं होता। किसी भी जन्मांग में यदि कालसर्प योग विद्यमान हो अथवा अन्य अशुभ योगों की संरचना हो रही हो, परन्तु यदि केन्द्र के स्वामियों का त्रिकोण से सम्बन्ध हो, लग्नेश बली हो या त्रिकोणों के स्वामी केन्द्र में संस्थित हों, भाग्य भवन प्रबल हो, कर्म भाव तथा लाभ भाव में शुभग्रहों की युति हो, तो इन अशुभ ग्रहों के प्रभाव में स्वतः ही पर्याप्त न्यूनता आ जाती है। ऐसी अनेक शुभ ग्रह स्थितियाँ हैं जिनके जन्मांग में विद्यमान होने पर कालसर्प योग स्वतः ही निर्मूल होता हुआ सा प्रतीत होता है क्योंकि उसका अशुभ फल जीवन में परिलक्षित नहीं होता। यदि इस तरह के जन्मांगों में जहाँ प्रभावशाली बली शुभ ग्रह योगों तथा राजयोगों का निर्माण हो रहा हो, वहाँ कालसर्प योग या केमद्रुम योग ऐसे अशुभ तथा आतंकित करने वाले योग विद्यमान भी हों, तो किसी तरह की ग्रह शान्ति, व्रत, दान अथवा अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं होती है। ज्योतिर्विदों को चाहिए कि कालसर्प योग के विषय में सम्यक् रूप से विचार करें। जन्मांग में विद्यमान शुभ तथा अशुभ ग्रहों के योगों का भी सम्यक् विश्लेषण करने के उपरान्त तथा राहु और केतु का प्रभाव व्यक्ति को कब समस्याओं में ग्रस्त करेगा, यह देखकर ही उसके विषय में निर्णय करें। यहाँ यह उल्लेख करना भी अनुचित न होगा कि कालसर्प योग एक ऐसा योग है जिसका होना अपने जन्मांग में जानकर कोई भी व्यक्ति चिंतित तथा व्यथित हो जाता है। अतः कालसर्प योग के दुष्प्रभाव के विषय का उल्लेख करते समय व्यक्ति की मानसिक स्थिति का ध्यान रखना चाहिए। किसी भी ग्रह योग को कठोरता या मधुरता के साथ व्यक्त किया जा सकता है। अतः यह ध्यान रखना चाहिए कि कालसर्प योग के विषय में कोई ऐसी अशुभ बात न कही जाये, जो व्यक्ति को व्यथित और अवसादग्रस्त कर दे।

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